रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शीतांग सन्निपातमें मनुष्यका शरीर अत्यंत शीतल होता है, तथा वमन, अतिसार, कम्प, क्षुधाका नाश, अंगमर्दन, शरीरकी पीड़ा, हिचकी, श्वास, श्रम, बेचैनी और संपूर्ण शरीरमें शिथिलता होती है ॥ १०४ ॥ आनन्द भैरव । हिंगुलञ्च विषं व्योषं मरिचं टंकणं कणा । जातीकोषसमं चूर्णं जम्बीरद्रवमर्दितम् ॥ १०५ ॥ रक्तिमानां वटीं कुर्यात्खादेदार्द्रकसंयुताम् । वटीद्वयं त्रयं वापि सन्निपाते सुदारुणे ॥ १०६ ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति तथाऽतीसारनाशनः । जीर्णज्वरहरश्चैव तथा सर्वाङ्गभेदकः ॥ १०७॥ सिंगरफ, विष, त्रिकुटा, कालीमिरच, सुहागा, पीपल और जाय- फल यह सब औषधि समान भाग लेकर जम्भीरीनींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली अथवा तीन गोली लेकर अदरखके साथ घोरतर सन्निपातज्वरमें देवे । यह औषधि आठ प्रकारके ज्वर, अतिसार, जीर्णज्वर, शरीर- भेद और आमवातादि रोगोंको नष्ट करती है । इसको आनन्दभैरव कहते हैं ॥ १०५-१०७ ॥ आनंद भैरवी । विषं त्रिकटुकं गन्धं टंकणं मृतशुल्वकम् । धूस्तूरस्य च बीजानि हिंगुलं नवमं स्मृतम् ॥१०८॥ एतानि समभागानि दिनैकं विजयाद्रवैः । मर्दयेच्चणकाभां तु वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १०९ ॥