रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १२९) ज्वर और कोष्ठगतज्वर नष्ट होते हैं। जो इस औषधिके सेवन कर- नेसे शरीरमें सन्ताप हो तो नारियलका जल पीना चाहिये। जो राईकी बराबर गोली गुण न करे तो एक एक रत्तीकी गोली बनावे। इसको सन्निपातनाशक त्रैलोक्यसुन्दर रस कहते हैं ॥ ९६-९९ ॥ स्वच्छन्द भैरव रस । रसगन्धकयोः शाणं प्रत्येकं कज्जलीकृतम् । सुवर्णमाक्षिकं शाणं शुद्धञ्चैकत्र कारयेत् ॥१००॥ रुद्रजटा सिन्दवारो नागरामलकी तथा । विषकण्टालिका चैषां स्वरसं शाणमात्रकम्॥१०१॥ दत्त्वा संशोध्य संमर्द्य कार्या मुद्गसमा वटी । आर्द्रकस्य रसैः पेया जीरकञ्चानु भक्षयेत् ॥१०२॥ स्वच्छन्दो भैरवाख्योऽयं सन्निपातोग्रहन्मतः । ग्रहणीसूतिकातङ्कं नाशयेदविचारतः ॥ १०३ ॥ पारा ४ मासे और गन्धक ४ मासे लेवे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर उसमें ४ मासे शुद्ध सोनामाखीभस्म फिर रुद्रजटा, सम्हालू, सोंठ, आमले और बांझककोड़े इन प्रत्येकके चार चार मासे स्वरसमें खरल करके मूंगके बराबर गोलियें बनावे। इनमेंसे एक गोली अदर- खके रसके साथ खावे ऊपरसे थोड़ासा जीरा चबावे तो यह स्वच्छन्द भैरव रस उग्र सन्निपातको दूर करता है एवं ग्रहणी तथा प्रसूति रोगको झट नष्ट कर देता है ॥ १००-१०३ ॥ शीतांग सन्निपातके लक्षण । शीतं शरीरं शीताङ्गे छर्द्यतीसारकम्पनम् । क्षुद्विघातोऽङ्गमर्दश्च हिक्का श्वासः श्रमोऽरतिः ॥ सर्वांगशिथिलत्वञ्च सन्निपाते प्रजायते ॥१०४॥