रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( १२९) ज्वर और कोष्ठगतज्वर नष्ट होते हैं। जो इस औषधिके सेवन कर- नेसे शरीरमें सन्ताप हो तो नारियलका जल पीना चाहिये। जो राईकी बराबर गोली गुण न करे तो एक एक रत्तीकी गोली बनावे। इसको सन्निपातनाशक त्रैलोक्यसुन्दर रस कहते हैं ॥ ९६-९९ ॥ स्वच्छन्द भैरव रस । रसगन्धकयोः शाणं प्रत्येकं कज्जलीकृतम् । सुवर्णमाक्षिकं शाणं शुद्धञ्चैकत्र कारयेत् ॥१००॥ रुद्रजटा सिन्दवारो नागरामलकी तथा । विषकण्टालिका चैषां स्वरसं शाणमात्रकम्॥१०१॥ दत्त्वा संशोध्य संमर्द्य कार्या मुद्गसमा वटी । आर्द्रकस्य रसैः पेया जीरकञ्चानु भक्षयेत् ॥१०२॥ स्वच्छन्दो भैरवाख्योऽयं सन्निपातोग्रहन्मतः । ग्रहणीसूतिकातङ्कं नाशयेदविचारतः ॥ १०३ ॥ पारा ४ मासे और गन्धक ४ मासे लेवे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर उसमें ४ मासे शुद्ध सोनामाखीभस्म फिर रुद्रजटा, सम्हालू, सोंठ, आमले और बांझककोड़े इन प्रत्येकके चार चार मासे स्वरसमें खरल करके मूंगके बराबर गोलियें बनावे। इनमेंसे एक गोली अदर- खके रसके साथ खावे ऊपरसे थोड़ासा जीरा चबावे तो यह स्वच्छन्द भैरव रस उग्र सन्निपातको दूर करता है एवं ग्रहणी तथा प्रसूति रोगको झट नष्ट कर देता है ॥ १००-१०३ ॥ शीतांग सन्निपातके लक्षण । शीतं शरीरं शीताङ्गे छर्द्यतीसारकम्पनम् । क्षुद्विघातोऽङ्गमर्दश्च हिक्का श्वासः श्रमोऽरतिः ॥ सर्वांगशिथिलत्वञ्च सन्निपाते प्रजायते ॥१०४॥
( १३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शीतांग सन्निपातमें मनुष्यका शरीर अत्यंत शीतल होता है, तथा वमन, अतिसार, कम्प, क्षुधाका नाश, अंगमर्दन, शरीरकी पीड़ा, हिचकी, श्वास, श्रम, बेचैनी और संपूर्ण शरीरमें शिथिलता होती है ॥ १०४ ॥ आनन्द भैरव । हिंगुलञ्च विषं व्योषं मरिचं टंकणं कणा । जातीकोषसमं चूर्णं जम्बीरद्रवमर्दितम् ॥ १०५ ॥ रक्तिमानां वटीं कुर्यात्खादेदार्द्रकसंयुताम् । वटीद्वयं त्रयं वापि सन्निपाते सुदारुणे ॥ १०६ ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति तथाऽतीसारनाशनः । जीर्णज्वरहरश्चैव तथा सर्वाङ्गभेदकः ॥ १०७॥ सिंगरफ, विष, त्रिकुटा, कालीमिरच, सुहागा, पीपल और जाय- फल यह सब औषधि समान भाग लेकर जम्भीरीनींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली अथवा तीन गोली लेकर अदरखके साथ घोरतर सन्निपातज्वरमें देवे । यह औषधि आठ प्रकारके ज्वर, अतिसार, जीर्णज्वर, शरीर- भेद और आमवातादि रोगोंको नष्ट करती है । इसको आनन्दभैरव कहते हैं ॥ १०५-१०७ ॥ आनंद भैरवी । विषं त्रिकटुकं गन्धं टंकणं मृतशुल्वकम् । धूस्तूरस्य च बीजानि हिंगुलं नवमं स्मृतम् ॥१०८॥ एतानि समभागानि दिनैकं विजयाद्रवैः । मर्दयेच्चणकाभां तु वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १०९ ॥
भाषाटीकासहित । ( १३१ )
भक्षयेच्च पिबेच्चानु रविमूलकषायकम् । सव्योषं हन्ति नो चित्रं सन्निपातं सुदारुणम् ॥११० विष, त्रिकुटा, गंधक, सुहागा, ताम्रभस्म, धतूरेके बीज और सिंगरफ यह नव ९ औषधि समान भाग लेकर भांगके रसमें अथवा जयंतीके रसमें खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे। एक गोली खाकर और ऊपरसे आककी जड़का क्वाथ पीवे। त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे घोरतर सन्निपातज्वर नष्ट होता है। इसको आनन्दभैरवीरस कहते हैं ॥ १०८-११० ॥ शीतांगे सन्निपाते वा सामान्ये वा त्रिदोषजे । धान्याकं पिप्पली शुण्ठी कटुकी कण्टकारिका॥११॥ पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं चतुर्गुञ्जा च पर्पटी । सन्निपातज्वरं हन्ति वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १२ ॥ मूलञ्च कटुरोहिण्याः समं बिल्वं सजीरकम् । दध्ना पिष्टं पिबेच्चानु वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १३ ॥ धनिया, पीपल, सोंठ, कुटकी और कटेरीके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर शीतांग सन्निपात अथवा साधारण सन्निपातमें इन आनन्दभैरवी गोलियोंका सेवन करना चाहिये । अथवा चार रत्ती परिमाण पर्पटी रसको लेकर इसी अधिकारमें कहे हुए इसी क्वाथसे सेवन करे तो सन्निपातज्वर नष्ट होता है । समान भाग कुटकीकी जड़, बेल और जीरा इन औषधियोंको दहीमें पीसकर आनन्दभैरवी- रसके अंतमें अनुपान सेवन करे ॥ ११-१३ ॥ सन्निपातातिसारघ्नी पथ्यं शाकविवर्जितम् । आनन्दभैरवीं पीत्वा क्वाथं वरुणसम्भवम् ॥ १४ ॥ पाययेदश्मरीं हन्ति सप्तरात्रान्न संशयः । वागुजीसम्भवैस्तैलैर्वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १५ ॥
( १३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेहयेन्निष्कमात्रान्तु गलत्कुष्ठञ्च नाशयेत् । दधिमस्तुसिताक्षौद्रैः वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १६ ॥ भक्षयेन्मूत्रकृच्छ्रार्त्तो यवक्षारं सितान्वितम् । गोदुग्धं कथितञ्चानु शीतलं मधुना पिबेत् ॥ १७ ॥ गुञ्जामूलं पिबेत्क्षीरैरनुपानं प्रशस्यते । अनेन चानुपानैन वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ देया रुद्रजटाक्षौद्रैः सर्वमेहप्रशान्तये ॥ १८ ॥ इस आनन्दभैरवी गोलीके सेवन करनेसे त्रिदोषज अतीसार नष्ट होता है । इस औषधि पर शाकरहित पथ्य सेवन करे । इस औष- धिका सेवन करके ऊपरसे वरनेकी छालका क्वाथ पान करनेसे सात दिनमें अश्मरीरोग नष्ट होता है । बावचीके तेलके साथ निष्क प्रमाण इस औषधिके सेवन करनेसे गलत्कुष्ठ नष्ट होता है । मूत्रकृच्छ्ररोगी दहीके तोड़, मिश्री
भाषाटीकासहित । ( १३३ ) शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक १ भाग और शुद्ध विष आधा ,भाग लेवे । इन सब औषधियोंको मुसलीके रसमें तीन दिन तक खरल करे, फिर एक आतशी शीशीमें भरकर उसका मुख बंद करके ऊप- रसे सात वार कपड़मिट्टी करके सात वार सुखावे, पश्चात् कुम्भीपुटमें पकावे, जब स्वांगशीतल होजावे तब उसमेंसे निकाल कर एक दिन खरल करे ॥ १९-२१ ॥ अजाजीजीरकं हिंगुसर्जिकाटङ्गणैर्युतम् । गुग्गुलुः पञ्चलवणं यवक्षारो यमानिका ॥ २२ ॥ मरिचं पिप्पली चैव प्रत्येकञ्च समांशतः । एषां कषायेण पुनर्भावयेत्सप्तधाऽऽतपे ॥ २३ ॥ नागवल्लीदलैर्युक्तं पञ्चगुञ्जं रसेश्वरम् । दद्यान्नवज्वरे तीव्रे कोष्णं वारि पिबेदनु ॥ २४ ॥ प्राणेश्वररसो नाम्ना सन्निपातप्रकोपजित् । शीतज्वरे दाहपूर्वे गुल्मे शूले त्रिदोषजे ॥ २५ ॥ वाञ्छितं भोजनं दद्यात्कुर्याच्चन्दनलेपनम् । तावदेव प्रशमनो नानातीसारनाशनः । भवेच्च नात्र संदेहः स्वास्थ्यञ्च लभते नरः ॥ २६ ॥ फिर कालाजीरा और सफेद जीरा, हींग, सज्जी, सुहागा, गूगल, पांचों नमक, जवाखार, अजवायन, कालीमिरच और पीपल यह सब औषधि समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर इनके क्वाथमें सात वार भावना देकर धूपमें सुखावे । इसमेंसे पांच रत्ती औषधि लेकर पानमें रखकर खावे और ऊपरसे गरम जल पीवे । इसको प्राणेश्वर रस कहते हैं । इसके सेवन करनेसे नवज्वर, सन्निपातज्वर, शीतज्वर, दाहपूर्वकज्वर, गुल्म, शूल और त्रिदोषज रोग नष्ट होते हैं । इसका सेवन करके इच्छानुसार पथ्य सेवन करे और शरीर पर चन्दनादिक
( १३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेप करे। यह औषधि अनेक प्रकारके अतिसारोंको नष्ट करती है तथा स्वस्थताको उत्पन्न करती है ॥ २२-२६ ॥ सन्निपातभैरव । ताम्रं गन्धं रसं श्वेतगुञ्जा मरिचपूतना । समीनपित्तजैपालांस्तुल्यानेकत्र मर्दयेत् ॥ २७ ॥ गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य नवज्वरहरं परम् । ज्वरांकुशः सन्निपातभैरवोऽयं प्रकाशितः ॥ २८ ॥ तांबा भस्म, गंधक, पारा, सफेदचोंटली, कालीमिरच, हरड़, रौहू- मछलीका पित्ता और जमालगोटे इन सबको समान भाग लेकर एकत्र अच्छे प्रकारसे खरल कर इस औषधिको चार रत्ती परिमाण सेवन करनेसे तत्काल नवीनज्वर नष्ट होजाता है। यह ज्वररूपी हस्तीके लिये अंकुशके समान है। इसको सन्निपातभैरव रस कहते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ शीतभञ्जी रस । रसो हिंगुलगन्धश्च जैपालं सम्मितं त्रिभिः । दंतीक्वाथेन संमर्द्य रसो ज्वरहरः परः ॥ २९ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव दापयेद्रक्तिकाद्वयम् । नवज्वरं महाघोरं नाशयेद्याममात्रतः ॥ १३० ॥ शर्करादधिभक्तञ्च पथ्यं देयं प्रयत्नतः । शीततोयं पिबेच्चानु इक्षुमुद्गरसो हितः । शीतभञ्जीरसो नाम सर्वज्वरकुलांतकः ॥ ३१ ॥ पारा, सिंगरफ और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे तीन भाग लेवे, इन सबको एकत्र दंतीके क्वाथमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारका ज्वर नष्ट होता है।
भाषाटीकासहित । ( १३५ ) इस औषधिके सेवन करनेसे एक प्रहरमें घोरतर नवीनज्वर नष्ट हो जाता है । इस औषधि पर मिश्री, दही और भात भोजन करे । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् शीतल जल पीवे तथा गन्नेका रस और मूंगका यूष इस पर अत्यन्त हितकारी है । इसको शीतभंजी रस कहते हैं । यह शीतभंजी रस सब प्रकारके ज्वरोंको अन्तक- स्वरूप है ॥ २९-३१ ॥ उन्मत्त रस । रसं गन्धञ्च तुल्यांशं धूस्तूरफलजैर्द्रवैः । मर्दयेद्दिनमेकन्तु तुल्यं त्रिकटुकं क्षिपेत् । उन्मत्ताख्यो रसो नाम रस्यः स्यात्सन्निपातजित् ३२ सन्निपातार्णवे मग्नं योऽभ्युपैति च रोगिणम् । कस्तेन न कृतो धर्मः काञ्च पूजां न सोऽर्हति ॥३३॥ पारा १ भाग और गंधक १ भाग लेवे, दोनोंको एकत्र धतूरेके फलोंके रसमें एक दिन खरल करे । फिर उसमें समान भाग त्रिकुटा मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरल करे । इसको उन्मत्त रस कहते हैं । इसकी नस्य ग्रहण करनेसे सन्निपात ज्वर नष्ट होजाता है । जो वैद्य इस सन्निपातरूपी समुद्रमें निमग्न हुए रोगीका उद्धार करता है उसने कौनसा धर्म नहीं किया और वह कौनसी पूजाके योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ मृतसञ्जीवन रस । म्लेच्छस्य भागाश्चत्वारो जैपालस्य त्रयो मताः । द्वौ भागौ टंकणस्यैव भागैकममृतस्य च ॥ ३४ ॥ तत्सर्वं मर्दयेच्छ्लक्ष्णं शुष्कं यामं भिषग्वरः । शृङ्गवेराम्बुना देयं व्योषचित्रकसैन्धवैः ॥ ३५ ॥ माषद्वयमितन्तापं हरत्येव विनिश्चयः । घनसारण सारेण चन्दनेन विलेपनम् ॥ ३६ ॥
( १३६ ) रसेंद्रसारसंग्रह । विदध्यात्कांस्यपात्रे च सेचयेद्रोगिणं भिषक् । शाल्यन्नं तक्रसहितं भोजयेदिक्षुसंयुतम् ॥ ३७ ॥ सन्निपाते महाघोरे त्रिदोषे विषमज्वरे । आमवाते वातशूले गुल्मे प्लीह्नि जलोदरे । शीतपूर्वे दाहपूर्वे विषमे संततज्वरे ॥ ३८ ॥ अग्निमांद्ये च वाते च प्रयोज्योऽयं रसेश्वरः । मृतसंजीवनो नाम विख्यातोऽयं रसायने ॥ ३९ ॥ सिंगरफ ४ भाग, जमालगोटे ३ भाग, सुहागा २ भाग और विष एक भाग लेवे, इन सबको एकत्र खरल करके सोंठके क्वाथमें एक प्रहर खरल करके सुखा लेवे। इस औषधिको त्रिकुटा, चित्रक और सेंधा नमकमें मिला करके दो मासे परिमाण अदरखके रसके साथ सेवन करे या ऊपरसे अदरखका रस पान करे इससे ज्वरका सन्ताप अवश्य दूर होजाता है। इस औषधिसेवनके पश्चात् कपूर और चन्द- नसे रोगीके शरीरको लिप्त करे तथा रोगीकी नाभिके ऊपर काँसीका पात्र स्थापन करके उसमें शीतल जलकी धारा छोड़े । पश्चात् तक्र और ईखके रसके साथ शालि चावलोंका भात खाये । यह औषधि घोरतर सन्निपातज्वर, त्रिदोषज, विषमज्वर, शीतपूर्व और दाहपूर्व, विषमज्वर, सततज्वर, आमवात, वातजन्यशूल, गुल्म, प्लीहा, जलोदर, मन्दाग्नि और वातरोगको दूर करती है। यह उत्तम रसायन है॥३४-३९॥ स्वल्प वडवानल रस । शुद्धताम्रस्य भागैकं मरिचस्य तथैव च । विषं तत्तुल्यकं दद्यात्सर्वं श्लक्ष्णं सुचूर्णितम् ॥ ४० ॥ लांगलीरससंयुक्तं तत्सर्वं पुटके पचेत् । रक्तिकाद्वितयं वापि त्रितयं वा प्रकल्पयेत् ॥ ४१ ॥
भाषाटीकासहित । ( १३७ ) दोषे व्योषसमायुक्तस्त्रिदोषशमनो भवेत् । भक्षयेत्पवने चोग्रे वडवानलसंज्ञितम् ॥ ४२ ॥ ताम्रभस्म १ भाग, मरिच १ भाग, विष २ भाग इन औषधियोंको एकत्र करके कलिहारीके रसमें खरल करके पुटपाक करे । रोगीके दोषोंका बलाबल विचार कर दो रत्ती अथवा तीन रत्ती औषधि सेवन करे । इसको त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज्वर शमन होता है । पवनकी अधिकतामें यह वडवानलसंज्ञित रस भक्षण करना चाहिये ॥ १४०-१४२ ॥ बृहद्वडवानल रस । सूतकं गन्धकं चैव हरितालं मनःशिला । अभ्रकं वत्सनाभञ्च दारुजङ्गमजं विषम् ॥ ४३ ॥ जैपालात्सार्द्धशतकं सर्वं संचूर्ण्य मर्दयेत् । मात्स्यमाहिषमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४४ ॥ वटिकां शीततोयेन कुर्याद्गुञ्जाप्रमाणतः । वडवानलनामाऽयं नारिकेलजलेन वै । रक्षयेत्सन्निपातार्तं मृत्युस्तस्यान्मुखो भवेत् ॥ ४५ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरिताल भस्म, मैनसिल भस्म, अभ्रक- भस्म, वत्सनाभविष, काष्ठविष और साँपका विष यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले, जमालगोटे १५० बीज इन सबका एकत्र चूर्ण करके मत्स्य, महिष, मयूर और बकरी इनके पित्तमें अलग अलग भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । सन्निपातसे पीड़ित रोगीको यह औषधि शीतल जल अथवा नारियलके जलके साथ सेवन करनेसे मृत्यु दूर भाग जाती है ॥ ४३-४५ ॥ सूचिकाभरण रस । रसगन्धकनागं च विषं स्थावरजंगमम् । मात्स्यवाराहमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४६ ॥
( १३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सूचिकाभरणो नाम भैरवेण प्रकीर्तितः । सूचिकाग्रेण दातव्यः सन्निपातनिबर्हणः ॥ ४७ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सीसाभस्म, स्थावर और जंगम विष ( सिंगिया विष और गरल ) यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र मछलीके पित्त, सुअरके पित्त, मोर और बकरेके पित्तमें अलग अलग भावना देवे । इसको सूचिकाभरण रस कहते हैं । यह औषधि स्वयं भैरवने कही है । इस औषधिमेंसे सुईके अग्रभागकी बराबर सेवन करे । यह सन्निपातको नष्ट करती है, इसको कोई सूचीसे शरी- रमें लगाते हैं ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ पञ्चानन रस । शम्भोः कण्ठविभूषणं समरिचं दैत्येन्द्ररक्तं रविः, पक्षौ सागरलोचनं शशियुगं भागोऽर्कसंख्यान्वितः। खल्ले तत्परिमर्दितं रविजलैर्गुञ्जैकमात्रं ददेत्, सिंहोऽयं ज्वरदंतिदर्पदलनः पंचाननाख्यो रसः४८॥ विष २ भाग, कालीमिरच ७ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, सिंगरफ २ भाग और तांबाभस्म १२ भाग इन सब औषधियोंको आकके मूलके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं, ज्वररूपी मत्तहस्तीके दर्पको दलनेके लिये यह औषधि सिंहके समान है ॥ ४८ ॥ त्रिदोषनीहाररवि रस । रसेन गन्धं द्विगुणं कृशानुरसैर्विमर्द्याष्टदिनानि घर्मे । रसाष्टभागं त्वमृतं च दद्याद्विमर्दयेद्वह्निरसेन किंचित् ॥ पिबेत्तु सम्भावित एष देय- स्त्रिदोषनीहारविनाशसूर्यः ॥ ४९ ॥
भाषाटीकासहित । ( १३९) शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गंधक २ भाग इन दोनोंको एकत्र रगड़ चित्रकके रसमें आठ दिन तक भावना देवे और खरल करे, फिर शुद्ध पारेसे आठवां भाग विष मिलाकर फिर चित्रकके रसमें खरल करे । इस औषधिका त्रिदोषजज्वरमें प्रयोग करै । इसको त्रिदोषनीहाररवि रस कहते हैं । यह त्रिदोषरूपी नीहारको नष्ट करनेके लिये सूर्य्यके समान है ॥ ४९ ॥ रसराजेन्द्र रस । पलं शुद्धस्य सूतस्य पलं ताम्रमयस्तथा । अभ्रं नागं पलं वङ्गं पलं गन्धकतालकम् ॥ १५० ॥ पलं शुद्धविषं चूर्णं सर्वमेकत्र कारयेत् । मर्दयेत्काकमाच्याश्च आर्द्रकस्य रसेन च ॥ ५१ ॥ मात्स्यवाराहमायूरच्छागमाहिषपित्तकैः । मर्दयेद्दिनभिन्नं च त्रिकटोरम्बुभिस्तथा ॥ ५२ ॥ शुद्ध पारा, तांवा भस्म, लोहा भस्म, अभ्रक भस्म, सीसा भस्म, वंग भस्म, शुद्ध गंधक, शुद्ध हरिताल भस्म और शुद्ध विष यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर बारीक चूर्ण करके मकोयके रसमें और अदरखके रसमें खरल करे । फिर मछली, सूअर, मोर, बकरी, और भैंस इनके पित्तोंमें अलग अलग भावना देकर पश्चात् त्रिकुटेके क्वाथमें भावना देवे ॥ १५०-१५२ ॥ सिद्धोऽयं रसराजेन्द्रो धन्वन्तरिसुसंस्कृतः । गुञ्जामात्रं रसं दद्यात्सुरसारससंयुक्तम् ॥ ५३ ॥ मेघवारिप्रवाहेण धारितं वारि मस्तके । निवारो यदा दाहस्तदा देया च शर्करा ॥ ५४ ॥ भोजनं दधिसंयुक्तं वारमेकन्तु दापयेत् ।
( १४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ईश्वरेण हतः कामः केशवेन च दानवः । पावकेन यथा शीतमनेन च तथा ज्वरः ॥ ५५ ॥ इसको रसराजेन्द्र कहते हैं । स्वयं धन्वन्तरिजीने यह औषधि कही है । एक रत्ती परिमाण इसको तुलसीके पत्तोंके रसके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेके पश्चात् रोगीके शिरपर जलकी धारा- ओंको प्रदान करे,यदि दाह शांत न हो तब शर्करा सेवन करनेके लिये देवे । दिनमें केवल एक बार दहीके साथ भोजन करे । जिस प्रकार महादेवके द्वारा कामदेव, कृष्णके द्वारा दानवकुल और अग्निके द्वारा शीत नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके द्वारा संपूर्ण ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ५३-५५ ॥ मृतसञ्जीवन रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्ले तत्कज्जलीकृतम् । अभ्रलोहकयोर्भस्म ताम्रभस्म समं समम् ॥ ५६ ॥ विषं तालं वराटञ्च शिलाहिंगुलचित्रकान् । हस्तिशुण्डी चातिविषा त्र्यूषणं हेममाक्षिकम् ॥५७॥ चूर्णं विमर्दयेद्भावैरार्द्रकस्य दिनत्रयम् । निर्गुण्डीं विजयाद्रावैस्त्रिदिनं मर्दयेत्पुनः ॥ ५८ ॥ काचकूप्यां निवेश्याथ वालुकायन्त्रगे पचेत् । द्वियामान्ते समुद्धृत्य मर्दयेदार्द्रकैर्द्रवैः ॥५९॥ मृतसञ्जीवनो नाम रसोऽयं शंकरोदितः । मृतोऽपि सन्निपातार्त्तो जीवत्येव न संशयः॥१६०॥ शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग इन दोनोंको खल्वमें मर्दन करके कज्जली बनावे । फिर अभ्रक,लोहा और तांबा इन सबकी भस्म, शुद्ध विष, शुद्ध हरिताल भस्म, कौड़ी भस्म, मैनशिल, सिंग्रफ,
भाषाटीकासहित । ( १४१ ) चित्रक, हाथीशुण्डी, अतीस, त्रिकुटा और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग ग्रहण करके उत्तम विधिसे चूर्ण करके उपरोक्त कज्जलीमें मिला देवे, फिर इसको अदरखके रसमें तीन दिनतक खरल करके फिर सम्हालूके रसमें तीन दिनतक खरल करे, पश्चात् भांगके पत्तोंके रसमें तीन दिन तक खरल करे । फिर इस औषधिको आतसी शीशीमें भरकर वालुकायन्त्रमें दोपहर तक पकावे । फिर इसको अदर- खके रसमें खरल करे । इसको मृतसंजीवन रस कहते हैं । इसको स्वयं महादेवने प्रकाशित किया है । इस औषधिके सेवन करनेसे मृत्युको प्राप्त हुआ सन्निपातरोगी भी आरोग्य होजाता है ॥ १५६-२६० ॥ गन्धक कज्जली । कण्टकारी सिन्धुवारस्तथा नाटकरञ्जकम् । अमीषां रसमादाय कृत्वा खर्परखण्डके ॥ ६१ ॥ प्रक्षिप्य गन्धकं तत्र ज्वालां मृद्वग्निना दहेत् । गन्धके स्नेहतापन्ने पारदं तत्समं क्षिपेत् ॥ ६२ ॥ मिश्रीकृत्य ततो द्वाभ्यां द्रवं तमवतारयेत् । आमर्दयेत्तथा तं तु यथा स्यात्कज्जलप्रभम् ॥ ६३ ॥ ततस्तु रक्तिकामस्य जीरकस्य च माषकम् । माषकं लवणस्यापि पर्णे कृत्वा प्रदापयेत् । ज्वरे त्रिदोषजे घोरे जलमुष्णं पिबेदनु ॥ ६४ ॥ कटेरी, सम्हालू और करंजके रसमें गंधकको डालकर अग्निके द्वारा गलावे, जब अच्छे प्रकारसे गल जाये तब बराबरका शुद्ध पारा मिला देवे । पश्चात् अच्छे प्रकारसे दोनोंको एकत्र खरल करके कजली बनावे । इसमेंसे प्रति दिन एक रत्ती परिमाण लेकर जीरेका चूर्ण एक मासा और सेंधानमक एक मासा मिलाकर पानके साथ सेवन करे । घोर त्रिदोषज्वरमें इस औषधिका सेवन करके ऊपरसे गरम जलका अनुपान करे ॥ ६१-६४ ॥ ६
( १४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । छर्द्यां शर्करया दद्यात्सामे दद्यात्तथा गुडम् । क्षये च छागदुग्धं स्यादनुपानं प्रयोजितम् ॥ ६५ ॥ रक्तातिसारे कुटजमूलवल्कलजं रसम् । रक्तबान्तौ तथा दद्यादुदुम्बरभवं रसम् ॥ ६६ ॥ सर्वव्याधिहरश्चायं गन्धकः कज्जलीकृतः । आयुर्वृद्धिकरश्चायं मृतञ्चापि प्रबोधयेत् ॥ ६७ ॥ ये रसाः पित्तसंयुक्ताः प्रोक्ताः सर्वत्र शंभुना । जलसेकावगाहैश्च बलिनस्ते तु नान्यथा । यथालाभेन पित्तेन रसाः सर्वे भवन्ति हि ॥ ६८ ॥ वमनरोगमें इस औषधिको मिश्रीके साथ, साम ज्वरमें गुड़के साथ, क्षयरोगमें बकरीके दूधके साथ, रक्तातीसारमें कुड़ेकी जड़की छालके रसके साथ और रुधिरकी वमनमें गूलरके रसके साथ इस औषधिका सेवन करना चाहिये। यह गंधककी कज्जली सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करती है और आयुको बढ़ाती है। इससे मृतक मनुष्य भी फिर चेतनालाभ करते हैं। महादेवने जो पित्तयुक्त औषधि कही हैं, उन पित्त संयुक्त औषधियोंके सेवनके पश्चात् रोगीको जलसेचन और अवगाहन ( स्नानादि ) क्रिया करानी चाहिये । क्योंकि पित्तमें मर्दन किये हुए रसोंका जलसेकादिसे ही बल बढता है अन्यथा नहीं. यह रस यथा- लाभ पित्तोंसे मर्दन करने चाहिये ॥ ६५-६८ ॥ बेताल रस । रसं गन्धं विषं चैव मरिचालं समांशिकम् । शिलायां मर्दयेत्तावद्यावज्जायेत कज्जलम् ॥ ६९ ॥ गुञ्जामात्रं प्रयोक्तव्यं हरेद्वादशसंज्ञकम् । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ।७०
भाषाटीकासहित । ( १४३ ) दन्तपंक्तिर्दृढा यस्य लोचने भ्रान्ततारके । चलिते चेन्द्रियग्रामे वेतालं विनियोजयेत् ॥ ७१ ॥ ग्लानेषु लिप्तदेहेषु मोहग्रस्तेषु देहिषु । दातुमर्हति वेतालो यमदूतनिवारकः ॥ ७२ ॥ पारा, गंधक, विष, मरिच और हरिताल यह सब शुद्ध औषधि समान भाग लेकर इनको तबतक खरल करे कि जबतक कज्जलीके समान न हो जाये । जब यह कज्जलीके समान होजाये तब इस औषधिको एक रत्ती परिमाण लेकर सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य बारह प्रकारके दारुण सन्निपात शीघ्र ही नष्ट होजाते हैं । जिसकी दांतोंकी पंक्ति अत्यंत दृढ हो तथा जिसके नेत्रोंके तारे घूमें और अन्यान्य इन्द्रियोंमें विकलता हो तो उसको यह वेताल रस खिलावै । मलीन मनुष्य, लिप्त शरीरवाला मनुष्य, मोहसे व्याकुल इत्यादि मनुष्योंको यह औषधि अत्युपकारी है । इसको वेताल रस कहते हैं ॥ ६९-७२ ॥ चन्द्रशेखर रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मरिचं टंकणं तथा । चतुस्तुल्या शिला योज्या मत्स्यपित्तेन भावयेत् ७३ त्रिदिनं मर्दयेत्तेन रसोऽयं चन्द्रशेखरः । द्विगुञ्जासार्द्रकद्रावैर्देयं शीतोदकं पुनः०॥ ७४ ॥ तक्रभक्तञ्च वृन्ताकं भिषक् तत्र प्रयोजयेत् । त्रिदिनाच्छ्लेष्मपित्तोत्थमत्युष्णं नाशयेज्ज्वरम् ७५॥ शुद्ध पारा, गंधक, कालीमिरच और सुहागा यह सब द्रव्य समान भाग लेवे और शुद्ध मैनाशील चार भाग लेवे, सबको एकत्र करके मछलीके पित्तकी भावना देकर तीन दिन तक खरल करे । इसको चन्द्रशेखर रस कहते हैं । इसकी दो दो रत्तीकी गोली बनाकर अदर- खके रसके साथ सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलका अनुपान करे ।
( १४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इसपर तक्र, भात और बैंगन सेवन करे । यह औषधि तीन दिनमें कफपित्तसे उत्पन्न हुए अत्यंत तीव्र ज्वरको नष्ट करती है ॥ ७३-७५ ॥ कस्तूरी भैरव । हिंगुलञ्च विषं टङ्कं जातीकोषफलं तथा । मरिचं पिप्पली चैव कस्तूरी च समं समम् । रक्तिद्वयं ततः खादेत्सन्निपाते सुदारुणे ॥ ७६ ॥ सिंगरफ, शुद्ध विष, सुहागा, जावित्री, जायफल, कालीमिरच पीपल और कस्तूरी यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करे । यह दारुण सन्नि- पातज्वरको दूर करता है ॥ ७६ ॥ बृहत्कस्तूरी भैरव । मृतं वङ्गं खर्परञ्च स्वर्णं कस्तूरितारकम् । एतेषां समभागेन कर्षमेकं पृथक् पृथक् ॥ ७७ ॥ मृतं कान्तं पलं देयं हेमसारं द्विकार्षिकम् । रसभस्म लवङ्गञ्च जातिकाफलमेव च ॥ ७८ ॥ वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं दिनसप्तकम् । द्रोणपुष्पीरसैर्वापि नागवल्ल्या रसेन च ॥ ७९ ॥ द्विचन्द्रौ त्रिकटुर्देयो यत्नतो वटिकाञ्चरेत् । वातात्मके सन्निपाते महाश्लेष्मगदेषु च ॥।१८०॥ त्रिदोषजनिते घोरे सन्निपाते सुदारुणे । नष्टगर्भे नष्टशुके प्रमेहे विषमज्वरे ॥ ८१ ॥ कासे श्वासे क्षये गुल्मे महाशोथे महागदे । स्त्रीणां शतं गच्छतश्च न च शुक्रक्षयो भवेत् । एतान्सर्वान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा॥८२॥
भाषाटीकासहित । ( १४५ ) वंग भस्म, खपरिया भस्म, सुवर्णभस्म, कस्तूरी और चांदीकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे, कांतलोहकी भस्म चार तोले, सोनामाखीकी भस्म, रससिन्दूर, लौंग और जाय- फल यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके द्रोणपुष्पी ( गूमा ) के रसमें सात दिन तक और पानोंके रसमें भी सात दिन तक भावना देवे, फिर इसमें कपूरका चूर्ण और त्रिकुटेका चूर्ण प्रत्येक दो दो तोला मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको वातिक, सान्निपातिक और कफके रोगोंमें, त्रिदोषजनित दारुण सन्निपात ज्वरमें, नष्टगर्भरोगमें, शुक्रकी क्षीणतामें, प्रमेह रोगमें, विषमज्वरमें, खांसीमें, श्वासरोगमें, क्षयरोगमें, गुल्मरोगमें और महाशोथमें प्रयुक्त करे । इस औषधिके सेवन करके सौ स्त्रियोंके साथ रमण करनेपर भी कदापि शुक्रका क्षय नहीं होता । जिस प्रकार सूर्य अंधकारके समूहको नष्ट कर देता है उसी प्रकार यह औषधि समस्त रोगोंको नष्ट करती है ॥ ७७-८२ ॥ मृगमदशशिसूर्या धातकी शूकशिम्बी, कनकरजतमुक्ता विद्रुमो लोहपाठाः । क्रिमिरिपुघनविश्वातोयतालाभ्रधात्री, रविदलरसपिष्टः कस्तुरीभैरवोऽयम् ॥ ८३ ॥ कस्तूरीभैरवः ख्यातः सर्वज्वरविनाशनः । आर्द्रकस्य रसैः पेयो विषमज्वरनाशनः ॥ ८४ ॥ द्वन्द्वजान् भौतिकांश्चापि ज्वरान्कामादिसम्भवान् । अभिचारकृतांश्चैव तथा शुक्रकृतान्पुनः । डाकिन्यादिकृतांश्चैवावेशजन्यान्निहन्त्ययम् ॥८५॥ द्वितीय कस्तूरीभैरव रस—कस्तूरी, कपूर, तांबा भस्म, धायके फूल, कौंचके बीज, सुवर्ण भस्म, रूपाभस्म, मोतीभस्म, प्रवालभस्म, लोह-
( १४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भस्म, पाठा, वायविडंग, नागरमोथा, सोंठ, सुगंधवाला, हरितालभस्म, अभ्रकभस्म और आमले यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके पत्तोंके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारके ज्वर, विषम ज्वर, तथा द्वन्द्वज, भौतिक, कामादिजनित, अभिचारज ज्वर, शुक्रस्थज्वर और डाकिन्यादि आवेशजनित ज्वर तत्काल नष्ट होजाते हैं ॥ ८३-८५ ॥ सौभाग्यवटी । सौभाग्यामृतजीरपञ्चलवणव्योषाभयाक्षामला, निश्चन्द्राभ्रकशुद्धगन्धकरसानेकीकृतान्भावयेत् । निर्गुण्डीयुगभृंगराजकवृषापामार्गपत्रोल्लसत्, प्रत्येकं स्वरसेन सिद्धवटिका घ्नन्ति त्रिदोषोदयम्८६ येषां शीतमतीव देहमखिलं स्वेदद्रवार्द्रीकृतं, निद्रा घोरतरा समस्तकरणव्यामोहमूढं मनः । शूलं श्वासबलासकाससहितं मूर्च्छारुचिं तृड्ज्वरं, तेषां वैपरिहृत्य जीवितमसौ गृह्णाति मृत्योर्मुखात्८७ सुहागा, विष, जीरा, पांचों लवण, त्रिकुटा, हरड, बहेडा, आमला, अभ्रक भस्म, गंधक और पारा यह सब द्रव्य समान भाग लेकर सम्हालू, भांगरा, काला भांगरा, अडूसा और चिरचिटा इन सबके पत्तोंके रसमें अलग अलग खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। यह गोली त्रिदोषजनित रोगोंको नष्ट करती है । जिन मनुष्योंके शरीरमें अतीव शीत व्याप्त हो गया हो तथा जिनका शरीर अत्यंत पसीनेसे भीज रहा हो, जो अतीव घोरतर निद्रासे विह्वल हो, जिनकी समस्त इन्द्रियें विकल और जिनका मन मुग्ध होगया हो उनको यह औषधि सेवन करनेसे शूल, श्वास, कफ, खाँसी, मूर्च्छा, अरुचि, तृषा और ज्वर नष्ट कर मृत्युके मुखसे भी बचा देती है ॥ ८६ ॥ ८७ ॥
भाषाटीकासहित । ( १४७ ) सन्निपातहर रस । सूतं गंधं टंकणं वै मरीचं व्योषं तद्वद्धस्तिनः पिप्पली च । सर्वं तुल्यं धूर्तनीरैः प्रपेष्य व्योष- क्षोदैर्कनीरैर्द्विगुञ्जम् ॥ ८८ ॥ पारा, गंधक, सुहागा, कालीमिरच, गजपीपल और त्रिकुटा यह सब औषधि समानभाग लेकर एकत्र धतूरेके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको आकके क्वाथ और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८८ ॥ सन्निपात वडवानल रस । रसस्याष्टौ सप्त विषात् षट् षड् गन्धालयोस्तथा । दन्तीबीजानि षड् भागाः पंचभागन्तु टङ्कणम्॥८९॥ चत्वारि धूर्तबीजस्य त्रयस्त्रिकटुकस्य च । एतानि वह्निमूलस्य क्वाथेन परिमर्दयेत् ॥ ९० ॥ आर्द्रकस्य रसेनाथ देयं गुंजाद्वयं हितम् । वडवानलसंज्ञोऽयं सन्निपातहरः परः ॥ ९१ ॥ पारा ८ भाग, विष ७ भाग, गन्धक ६ भाग, हरिताल ६ भाग, जमालगोटे ६ भाग, सुहागा ५ भाग, धतूरेके बीज ४ भाग और त्रिकुटा ३ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र चीतेके क्वाथमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरखके रसके साथ सेवन करे । यह वडवानल रस सन्निपातज्वरको नष्ट करता है॥८९-९१॥ सिंहनाद रस । लोहपात्रगते गन्धे द्राविते तत्र निक्षिपेत् । शुद्धसूतं समं चाभ्रं भार्गीद्रावं तयोः समम् ॥ ९२ ॥ निर्गुण्डयाः पल्लवोत्थञ्च तुल्यं तुल्यं प्रदापयेत् । पचेन्मृद्वग्निना तावद्यावच्छुष्कं द्रवं द्वयम् ॥९३॥
' or 'द्व'? Wait, look at 'द्व' in line 19: 'वल्लद्वयं'. In 'वल्लद्वयं', 'द्व' has द् on top, व below. In line 21, the letter after या has द् on top, and... wait! Could it be: या (yaa) द्व (dva) भ (bha)? Wait, look at the letters:
- या
- द्
- भ
- वे
- द्दुः Wait, could it be: या + द् + भ + वे + द्दुः ? Wait, if it's "यावद्भवेद्दुःसहशीत-", how did the typesetter typeset it? Could the typesetter have dropped 'व' and set "याद्भवेद्दुःसहशीत-"? Look at the character after 'वे': Could it be 'द्दुः'? YES! In many old fonts, 'द्दु' (द् + दु) was a ligature: द् on top of दु! When द् is placed on top of दु, the top द् has a small belly, the lower दु has a loop, looking just like a 'ह'! Yes! द् + दु = द्दु! And before 'सह' there is visarga 'ः', making it 'द्दुः'! So it IS "द्दुः"! And what is the letter between या and वे? It's 'द्भ'! So the types