रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सूचिकाभरणो नाम भैरवेण प्रकीर्तितः । सूचिकाग्रेण दातव्यः सन्निपातनिबर्हणः ॥ ४७ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सीसाभस्म, स्थावर और जंगम विष ( सिंगिया विष और गरल ) यह सब औषधि समान भाग लेकर एकत्र मछलीके पित्त, सुअरके पित्त, मोर और बकरेके पित्तमें अलग अलग भावना देवे । इसको सूचिकाभरण रस कहते हैं । यह औषधि स्वयं भैरवने कही है । इस औषधिमेंसे सुईके अग्रभागकी बराबर सेवन करे । यह सन्निपातको नष्ट करती है, इसको कोई सूचीसे शरी- रमें लगाते हैं ॥ ४६ ॥ ४७ ॥ पञ्चानन रस । शम्भोः कण्ठविभूषणं समरिचं दैत्येन्द्ररक्तं रविः, पक्षौ सागरलोचनं शशियुगं भागोऽर्कसंख्यान्वितः। खल्ले तत्परिमर्दितं रविजलैर्गुञ्जैकमात्रं ददेत्, सिंहोऽयं ज्वरदंतिदर्पदलनः पंचाननाख्यो रसः४८॥ विष २ भाग, कालीमिरच ७ भाग, शुद्ध गंधक २ भाग, सिंगरफ २ भाग और तांबाभस्म १२ भाग इन सब औषधियोंको आकके मूलके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं, ज्वररूपी मत्तहस्तीके दर्पको दलनेके लिये यह औषधि सिंहके समान है ॥ ४८ ॥ त्रिदोषनीहाररवि रस । रसेन गन्धं द्विगुणं कृशानुरसैर्विमर्द्याष्टदिनानि घर्मे । रसाष्टभागं त्वमृतं च दद्याद्विमर्दयेद्वह्निरसेन किंचित् ॥ पिबेत्तु सम्भावित एष देय- स्त्रिदोषनीहारविनाशसूर्यः ॥ ४९ ॥