रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १३७ ) दोषे व्योषसमायुक्तस्त्रिदोषशमनो भवेत् । भक्षयेत्पवने चोग्रे वडवानलसंज्ञितम् ॥ ४२ ॥ ताम्रभस्म १ भाग, मरिच १ भाग, विष २ भाग इन औषधियोंको एकत्र करके कलिहारीके रसमें खरल करके पुटपाक करे । रोगीके दोषोंका बलाबल विचार कर दो रत्ती अथवा तीन रत्ती औषधि सेवन करे । इसको त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज्वर शमन होता है । पवनकी अधिकतामें यह वडवानलसंज्ञित रस भक्षण करना चाहिये ॥ १४०-१४२ ॥ बृहद्वडवानल रस । सूतकं गन्धकं चैव हरितालं मनःशिला । अभ्रकं वत्सनाभञ्च दारुजङ्गमजं विषम् ॥ ४३ ॥ जैपालात्सार्द्धशतकं सर्वं संचूर्ण्य मर्दयेत् । मात्स्यमाहिषमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४४ ॥ वटिकां शीततोयेन कुर्याद्गुञ्जाप्रमाणतः । वडवानलनामाऽयं नारिकेलजलेन वै । रक्षयेत्सन्निपातार्तं मृत्युस्तस्यान्मुखो भवेत् ॥ ४५ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, हरिताल भस्म, मैनसिल भस्म, अभ्रक- भस्म, वत्सनाभविष, काष्ठविष और साँपका विष यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले, जमालगोटे १५० बीज इन सबका एकत्र चूर्ण करके मत्स्य, महिष, मयूर और बकरी इनके पित्तमें अलग अलग भावना देकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । सन्निपातसे पीड़ित रोगीको यह औषधि शीतल जल अथवा नारियलके जलके साथ सेवन करनेसे मृत्यु दूर भाग जाती है ॥ ४३-४५ ॥ सूचिकाभरण रस । रसगन्धकनागं च विषं स्थावरजंगमम् । मात्स्यवाराहमायूरच्छागपित्तैर्विभावयेत् ॥ ४६ ॥