भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १३९) शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गंधक २ भाग इन दोनोंको एकत्र रगड़ चित्रकके रसमें आठ दिन तक भावना देवे और खरल करे, फिर शुद्ध पारेसे आठवां भाग विष मिलाकर फिर चित्रकके रसमें खरल करे । इस औषधिका त्रिदोषजज्वरमें प्रयोग करै । इसको त्रिदोषनीहाररवि रस कहते हैं । यह त्रिदोषरूपी नीहारको नष्ट करनेके लिये सूर्य्यके समान है ॥ ४९ ॥ रसराजेन्द्र रस । पलं शुद्धस्य सूतस्य पलं ताम्रमयस्तथा । अभ्रं नागं पलं वङ्गं पलं गन्धकतालकम् ॥ १५० ॥ पलं शुद्धविषं चूर्णं सर्वमेकत्र कारयेत् । मर्दयेत्काकमाच्याश्च आर्द्रकस्य रसेन च ॥ ५१ ॥ मात्स्यवाराहमायूरच्छागमाहिषपित्तकैः । मर्दयेद्दिनभिन्नं च त्रिकटोरम्बुभिस्तथा ॥ ५२ ॥ शुद्ध पारा, तांवा भस्म, लोहा भस्म, अभ्रक भस्म, सीसा भस्म, वंग भस्म, शुद्ध गंधक, शुद्ध हरिताल भस्म और शुद्ध विष यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर बारीक चूर्ण करके मकोयके रसमें और अदरखके रसमें खरल करे । फिर मछली, सूअर, मोर, बकरी, और भैंस इनके पित्तोंमें अलग अलग भावना देकर पश्चात् त्रिकुटेके क्वाथमें भावना देवे ॥ १५०-१५२ ॥ सिद्धोऽयं रसराजेन्द्रो धन्वन्तरिसुसंस्कृतः । गुञ्जामात्रं रसं दद्यात्सुरसारससंयुक्तम् ॥ ५३ ॥ मेघवारिप्रवाहेण धारितं वारि मस्तके । निवारो यदा दाहस्तदा देया च शर्करा ॥ ५४ ॥ भोजनं दधिसंयुक्तं वारमेकन्तु दापयेत् ।