रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ईश्वरेण हतः कामः केशवेन च दानवः । पावकेन यथा शीतमनेन च तथा ज्वरः ॥ ५५ ॥ इसको रसराजेन्द्र कहते हैं । स्वयं धन्वन्तरिजीने यह औषधि कही है । एक रत्ती परिमाण इसको तुलसीके पत्तोंके रसके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेके पश्चात् रोगीके शिरपर जलकी धारा- ओंको प्रदान करे,यदि दाह शांत न हो तब शर्करा सेवन करनेके लिये देवे । दिनमें केवल एक बार दहीके साथ भोजन करे । जिस प्रकार महादेवके द्वारा कामदेव, कृष्णके द्वारा दानवकुल और अग्निके द्वारा शीत नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके द्वारा संपूर्ण ज्वर नष्ट होते हैं ॥ ५३-५५ ॥ मृतसञ्जीवन रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं खल्ले तत्कज्जलीकृतम् । अभ्रलोहकयोर्भस्म ताम्रभस्म समं समम् ॥ ५६ ॥ विषं तालं वराटञ्च शिलाहिंगुलचित्रकान् । हस्तिशुण्डी चातिविषा त्र्यूषणं हेममाक्षिकम् ॥५७॥ चूर्णं विमर्दयेद्भावैरार्द्रकस्य दिनत्रयम् । निर्गुण्डीं विजयाद्रावैस्त्रिदिनं मर्दयेत्पुनः ॥ ५८ ॥ काचकूप्यां निवेश्याथ वालुकायन्त्रगे पचेत् । द्वियामान्ते समुद्धृत्य मर्दयेदार्द्रकैर्द्रवैः ॥५९॥ मृतसञ्जीवनो नाम रसोऽयं शंकरोदितः । मृतोऽपि सन्निपातार्त्तो जीवत्येव न संशयः॥१६०॥ शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध गन्धक २ भाग इन दोनोंको खल्वमें मर्दन करके कज्जली बनावे । फिर अभ्रक,लोहा और तांबा इन सबकी भस्म, शुद्ध विष, शुद्ध हरिताल भस्म, कौड़ी भस्म, मैनशिल, सिंग्रफ,