भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १४१ ) चित्रक, हाथीशुण्डी, अतीस, त्रिकुटा और सोनामाखी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग ग्रहण करके उत्तम विधिसे चूर्ण करके उपरोक्त कज्जलीमें मिला देवे, फिर इसको अदरखके रसमें तीन दिनतक खरल करके फिर सम्हालूके रसमें तीन दिनतक खरल करे, पश्चात् भांगके पत्तोंके रसमें तीन दिन तक खरल करे । फिर इस औषधिको आतसी शीशीमें भरकर वालुकायन्त्रमें दोपहर तक पकावे । फिर इसको अदर- खके रसमें खरल करे । इसको मृतसंजीवन रस कहते हैं । इसको स्वयं महादेवने प्रकाशित किया है । इस औषधिके सेवन करनेसे मृत्युको प्राप्त हुआ सन्निपातरोगी भी आरोग्य होजाता है ॥ १५६-२६० ॥ गन्धक कज्जली । कण्टकारी सिन्धुवारस्तथा नाटकरञ्जकम् । अमीषां रसमादाय कृत्वा खर्परखण्डके ॥ ६१ ॥ प्रक्षिप्य गन्धकं तत्र ज्वालां मृद्वग्निना दहेत् । गन्धके स्नेहतापन्ने पारदं तत्समं क्षिपेत् ॥ ६२ ॥ मिश्रीकृत्य ततो द्वाभ्यां द्रवं तमवतारयेत् । आमर्दयेत्तथा तं तु यथा स्यात्कज्जलप्रभम् ॥ ६३ ॥ ततस्तु रक्तिकामस्य जीरकस्य च माषकम् । माषकं लवणस्यापि पर्णे कृत्वा प्रदापयेत् । ज्वरे त्रिदोषजे घोरे जलमुष्णं पिबेदनु ॥ ६४ ॥ कटेरी, सम्हालू और करंजके रसमें गंधकको डालकर अग्निके द्वारा गलावे, जब अच्छे प्रकारसे गल जाये तब बराबरका शुद्ध पारा मिला देवे । पश्चात् अच्छे प्रकारसे दोनोंको एकत्र खरल करके कजली बनावे । इसमेंसे प्रति दिन एक रत्ती परिमाण लेकर जीरेका चूर्ण एक मासा और सेंधानमक एक मासा मिलाकर पानके साथ सेवन करे । घोर त्रिदोषज्वरमें इस औषधिका सेवन करके ऊपरसे गरम जलका अनुपान करे ॥ ६१-६४ ॥ ६