रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । छर्द्यां शर्करया दद्यात्सामे दद्यात्तथा गुडम् । क्षये च छागदुग्धं स्यादनुपानं प्रयोजितम् ॥ ६५ ॥ रक्तातिसारे कुटजमूलवल्कलजं रसम् । रक्तबान्तौ तथा दद्यादुदुम्बरभवं रसम् ॥ ६६ ॥ सर्वव्याधिहरश्चायं गन्धकः कज्जलीकृतः । आयुर्वृद्धिकरश्चायं मृतञ्चापि प्रबोधयेत् ॥ ६७ ॥ ये रसाः पित्तसंयुक्ताः प्रोक्ताः सर्वत्र शंभुना । जलसेकावगाहैश्च बलिनस्ते तु नान्यथा । यथालाभेन पित्तेन रसाः सर्वे भवन्ति हि ॥ ६८ ॥ वमनरोगमें इस औषधिको मिश्रीके साथ, साम ज्वरमें गुड़के साथ, क्षयरोगमें बकरीके दूधके साथ, रक्तातीसारमें कुड़ेकी जड़की छालके रसके साथ और रुधिरकी वमनमें गूलरके रसके साथ इस औषधिका सेवन करना चाहिये। यह गंधककी कज्जली सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करती है और आयुको बढ़ाती है। इससे मृतक मनुष्य भी फिर चेतनालाभ करते हैं। महादेवने जो पित्तयुक्त औषधि कही हैं, उन पित्त संयुक्त औषधियोंके सेवनके पश्चात् रोगीको जलसेचन और अवगाहन ( स्नानादि ) क्रिया करानी चाहिये । क्योंकि पित्तमें मर्दन किये हुए रसोंका जलसेकादिसे ही बल बढता है अन्यथा नहीं. यह रस यथा- लाभ पित्तोंसे मर्दन करने चाहिये ॥ ६५-६८ ॥ बेताल रस । रसं गन्धं विषं चैव मरिचालं समांशिकम् । शिलायां मर्दयेत्तावद्यावज्जायेत कज्जलम् ॥ ६९ ॥ गुञ्जामात्रं प्रयोक्तव्यं हरेद्वादशसंज्ञकम् । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ।७०