रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १४३ ) दन्तपंक्तिर्दृढा यस्य लोचने भ्रान्ततारके । चलिते चेन्द्रियग्रामे वेतालं विनियोजयेत् ॥ ७१ ॥ ग्लानेषु लिप्तदेहेषु मोहग्रस्तेषु देहिषु । दातुमर्हति वेतालो यमदूतनिवारकः ॥ ७२ ॥ पारा, गंधक, विष, मरिच और हरिताल यह सब शुद्ध औषधि समान भाग लेकर इनको तबतक खरल करे कि जबतक कज्जलीके समान न हो जाये । जब यह कज्जलीके समान होजाये तब इस औषधिको एक रत्ती परिमाण लेकर सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य बारह प्रकारके दारुण सन्निपात शीघ्र ही नष्ट होजाते हैं । जिसकी दांतोंकी पंक्ति अत्यंत दृढ हो तथा जिसके नेत्रोंके तारे घूमें और अन्यान्य इन्द्रियोंमें विकलता हो तो उसको यह वेताल रस खिलावै । मलीन मनुष्य, लिप्त शरीरवाला मनुष्य, मोहसे व्याकुल इत्यादि मनुष्योंको यह औषधि अत्युपकारी है । इसको वेताल रस कहते हैं ॥ ६९-७२ ॥ चन्द्रशेखर रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मरिचं टंकणं तथा । चतुस्तुल्या शिला योज्या मत्स्यपित्तेन भावयेत् ७३ त्रिदिनं मर्दयेत्तेन रसोऽयं चन्द्रशेखरः । द्विगुञ्जासार्द्रकद्रावैर्देयं शीतोदकं पुनः०॥ ७४ ॥ तक्रभक्तञ्च वृन्ताकं भिषक् तत्र प्रयोजयेत् । त्रिदिनाच्छ्लेष्मपित्तोत्थमत्युष्णं नाशयेज्ज्वरम् ७५॥ शुद्ध पारा, गंधक, कालीमिरच और सुहागा यह सब द्रव्य समान भाग लेवे और शुद्ध मैनाशील चार भाग लेवे, सबको एकत्र करके मछलीके पित्तकी भावना देकर तीन दिन तक खरल करे । इसको चन्द्रशेखर रस कहते हैं । इसकी दो दो रत्तीकी गोली बनाकर अदर- खके रसके साथ सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलका अनुपान करे ।