रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लेप करे। यह औषधि अनेक प्रकारके अतिसारोंको नष्ट करती है तथा स्वस्थताको उत्पन्न करती है ॥ २२-२६ ॥ सन्निपातभैरव । ताम्रं गन्धं रसं श्वेतगुञ्जा मरिचपूतना । समीनपित्तजैपालांस्तुल्यानेकत्र मर्दयेत् ॥ २७ ॥ गुञ्जाचतुष्टयञ्चास्य नवज्वरहरं परम् । ज्वरांकुशः सन्निपातभैरवोऽयं प्रकाशितः ॥ २८ ॥ तांबा भस्म, गंधक, पारा, सफेदचोंटली, कालीमिरच, हरड़, रौहू- मछलीका पित्ता और जमालगोटे इन सबको समान भाग लेकर एकत्र अच्छे प्रकारसे खरल कर इस औषधिको चार रत्ती परिमाण सेवन करनेसे तत्काल नवीनज्वर नष्ट होजाता है। यह ज्वररूपी हस्तीके लिये अंकुशके समान है। इसको सन्निपातभैरव रस कहते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ शीतभञ्जी रस । रसो हिंगुलगन्धश्च जैपालं सम्मितं त्रिभिः । दंतीक्वाथेन संमर्द्य रसो ज्वरहरः परः ॥ २९ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव दापयेद्रक्तिकाद्वयम् । नवज्वरं महाघोरं नाशयेद्याममात्रतः ॥ १३० ॥ शर्करादधिभक्तञ्च पथ्यं देयं प्रयत्नतः । शीततोयं पिबेच्चानु इक्षुमुद्गरसो हितः । शीतभञ्जीरसो नाम सर्वज्वरकुलांतकः ॥ ३१ ॥ पारा, सिंगरफ और गंधक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे तीन भाग लेवे, इन सबको एकत्र दंतीके क्वाथमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। एक गोली अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारका ज्वर नष्ट होता है।