रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १३३ ) शुद्ध पारा १ भाग, शुद्ध गंधक १ भाग और शुद्ध विष आधा ,भाग लेवे । इन सब औषधियोंको मुसलीके रसमें तीन दिन तक खरल करे, फिर एक आतशी शीशीमें भरकर उसका मुख बंद करके ऊप- रसे सात वार कपड़मिट्टी करके सात वार सुखावे, पश्चात् कुम्भीपुटमें पकावे, जब स्वांगशीतल होजावे तब उसमेंसे निकाल कर एक दिन खरल करे ॥ १९-२१ ॥ अजाजीजीरकं हिंगुसर्जिकाटङ्गणैर्युतम् । गुग्गुलुः पञ्चलवणं यवक्षारो यमानिका ॥ २२ ॥ मरिचं पिप्पली चैव प्रत्येकञ्च समांशतः । एषां कषायेण पुनर्भावयेत्सप्तधाऽऽतपे ॥ २३ ॥ नागवल्लीदलैर्युक्तं पञ्चगुञ्जं रसेश्वरम् । दद्यान्नवज्वरे तीव्रे कोष्णं वारि पिबेदनु ॥ २४ ॥ प्राणेश्वररसो नाम्ना सन्निपातप्रकोपजित् । शीतज्वरे दाहपूर्वे गुल्मे शूले त्रिदोषजे ॥ २५ ॥ वाञ्छितं भोजनं दद्यात्कुर्याच्चन्दनलेपनम् । तावदेव प्रशमनो नानातीसारनाशनः । भवेच्च नात्र संदेहः स्वास्थ्यञ्च लभते नरः ॥ २६ ॥ फिर कालाजीरा और सफेद जीरा, हींग, सज्जी, सुहागा, गूगल, पांचों नमक, जवाखार, अजवायन, कालीमिरच और पीपल यह सब औषधि समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर इनके क्वाथमें सात वार भावना देकर धूपमें सुखावे । इसमेंसे पांच रत्ती औषधि लेकर पानमें रखकर खावे और ऊपरसे गरम जल पीवे । इसको प्राणेश्वर रस कहते हैं । इसके सेवन करनेसे नवज्वर, सन्निपातज्वर, शीतज्वर, दाहपूर्वकज्वर, गुल्म, शूल और त्रिदोषज रोग नष्ट होते हैं । इसका सेवन करके इच्छानुसार पथ्य सेवन करे और शरीर पर चन्दनादिक