भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १३१ )

भक्षयेच्च पिबेच्चानु रविमूलकषायकम् । सव्योषं हन्ति नो चित्रं सन्निपातं सुदारुणम् ॥११० विष, त्रिकुटा, गंधक, सुहागा, ताम्रभस्म, धतूरेके बीज और सिंगरफ यह नव ९ औषधि समान भाग लेकर भांगके रसमें अथवा जयंतीके रसमें खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे। एक गोली खाकर और ऊपरसे आककी जड़का क्वाथ पीवे। त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे घोरतर सन्निपातज्वर नष्ट होता है। इसको आनन्दभैरवीरस कहते हैं ॥ १०८-११० ॥ शीतांगे सन्निपाते वा सामान्ये वा त्रिदोषजे । धान्याकं पिप्पली शुण्ठी कटुकी कण्टकारिका॥११॥ पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं चतुर्गुञ्जा च पर्पटी । सन्निपातज्वरं हन्ति वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १२ ॥ मूलञ्च कटुरोहिण्याः समं बिल्वं सजीरकम् । दध्ना पिष्टं पिबेच्चानु वटिकाऽऽनन्दभैरवी ॥ १३ ॥ धनिया, पीपल, सोंठ, कुटकी और कटेरीके क्वाथमें पीपलका चूर्ण डालकर शीतांग सन्निपात अथवा साधारण सन्निपातमें इन आनन्दभैरवी गोलियोंका सेवन करना चाहिये । अथवा चार रत्ती परिमाण पर्पटी रसको लेकर इसी अधिकारमें कहे हुए इसी क्वाथसे सेवन करे तो सन्निपातज्वर नष्ट होता है । समान भाग कुटकीकी जड़, बेल और जीरा इन औषधियोंको दहीमें पीसकर आनन्दभैरवी- रसके अंतमें अनुपान सेवन करे ॥ ११-१३ ॥ सन्निपातातिसारघ्नी पथ्यं शाकविवर्जितम् । आनन्दभैरवीं पीत्वा क्वाथं वरुणसम्भवम् ॥ १४ ॥ पाययेदश्मरीं हन्ति सप्तरात्रान्न संशयः । वागुजीसम्भवैस्तैलैर्वटीञ्चानन्दभैरवीम् ॥ १५ ॥