रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १४५ ) वंग भस्म, खपरिया भस्म, सुवर्णभस्म, कस्तूरी और चांदीकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे, कांतलोहकी भस्म चार तोले, सोनामाखीकी भस्म, रससिन्दूर, लौंग और जाय- फल यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके द्रोणपुष्पी ( गूमा ) के रसमें सात दिन तक और पानोंके रसमें भी सात दिन तक भावना देवे, फिर इसमें कपूरका चूर्ण और त्रिकुटेका चूर्ण प्रत्येक दो दो तोला मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको वातिक, सान्निपातिक और कफके रोगोंमें, त्रिदोषजनित दारुण सन्निपात ज्वरमें, नष्टगर्भरोगमें, शुक्रकी क्षीणतामें, प्रमेह रोगमें, विषमज्वरमें, खांसीमें, श्वासरोगमें, क्षयरोगमें, गुल्मरोगमें और महाशोथमें प्रयुक्त करे । इस औषधिके सेवन करके सौ स्त्रियोंके साथ रमण करनेपर भी कदापि शुक्रका क्षय नहीं होता । जिस प्रकार सूर्य अंधकारके समूहको नष्ट कर देता है उसी प्रकार यह औषधि समस्त रोगोंको नष्ट करती है ॥ ७७-८२ ॥ मृगमदशशिसूर्या धातकी शूकशिम्बी, कनकरजतमुक्ता विद्रुमो लोहपाठाः । क्रिमिरिपुघनविश्वातोयतालाभ्रधात्री, रविदलरसपिष्टः कस्तुरीभैरवोऽयम् ॥ ८३ ॥ कस्तूरीभैरवः ख्यातः सर्वज्वरविनाशनः । आर्द्रकस्य रसैः पेयो विषमज्वरनाशनः ॥ ८४ ॥ द्वन्द्वजान् भौतिकांश्चापि ज्वरान्कामादिसम्भवान् । अभिचारकृतांश्चैव तथा शुक्रकृतान्पुनः । डाकिन्यादिकृतांश्चैवावेशजन्यान्निहन्त्ययम् ॥८५॥ द्वितीय कस्तूरीभैरव रस—कस्तूरी, कपूर, तांबा भस्म, धायके फूल, कौंचके बीज, सुवर्ण भस्म, रूपाभस्म, मोतीभस्म, प्रवालभस्म, लोह-