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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( १४५ ) वंग भस्म, खपरिया भस्म, सुवर्णभस्म, कस्तूरी और चांदीकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे, कांतलोहकी भस्म चार तोले, सोनामाखीकी भस्म, रससिन्दूर, लौंग और जाय- फल यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके द्रोणपुष्पी ( गूमा ) के रसमें सात दिन तक और पानोंके रसमें भी सात दिन तक भावना देवे, फिर इसमें कपूरका चूर्ण और त्रिकुटेका चूर्ण प्रत्येक दो दो तोला मिलाकर अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इन गोलियोंको वातिक, सान्निपातिक और कफके रोगोंमें, त्रिदोषजनित दारुण सन्निपात ज्वरमें, नष्टगर्भरोगमें, शुक्रकी क्षीणतामें, प्रमेह रोगमें, विषमज्वरमें, खांसीमें, श्वासरोगमें, क्षयरोगमें, गुल्मरोगमें और महाशोथमें प्रयुक्त करे । इस औषधिके सेवन करके सौ स्त्रियोंके साथ रमण करनेपर भी कदापि शुक्रका क्षय नहीं होता । जिस प्रकार सूर्य अंधकारके समूहको नष्ट कर देता है उसी प्रकार यह औषधि समस्त रोगोंको नष्ट करती है ॥ ७७-८२ ॥ मृगमदशशिसूर्या धातकी शूकशिम्बी, कनकरजतमुक्ता विद्रुमो लोहपाठाः । क्रिमिरिपुघनविश्वातोयतालाभ्रधात्री, रविदलरसपिष्टः कस्तुरीभैरवोऽयम् ॥ ८३ ॥ कस्तूरीभैरवः ख्यातः सर्वज्वरविनाशनः । आर्द्रकस्य रसैः पेयो विषमज्वरनाशनः ॥ ८४ ॥ द्वन्द्वजान् भौतिकांश्चापि ज्वरान्कामादिसम्भवान् । अभिचारकृतांश्चैव तथा शुक्रकृतान्पुनः । डाकिन्यादिकृतांश्चैवावेशजन्यान्निहन्त्ययम् ॥८५॥ द्वितीय कस्तूरीभैरव रस—कस्तूरी, कपूर, तांबा भस्म, धायके फूल, कौंचके बीज, सुवर्ण भस्म, रूपाभस्म, मोतीभस्म, प्रवालभस्म, लोह-

( १४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भस्म, पाठा, वायविडंग, नागरमोथा, सोंठ, सुगंधवाला, हरितालभस्म, अभ्रकभस्म और आमले यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके पत्तोंके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारके ज्वर, विषम ज्वर, तथा द्वन्द्वज, भौतिक, कामादिजनित, अभिचारज ज्वर, शुक्रस्थज्वर और डाकिन्यादि आवेशजनित ज्वर तत्काल नष्ट होजाते हैं ॥ ८३-८५ ॥ सौभाग्यवटी । सौभाग्यामृतजीरपञ्चलवणव्योषाभयाक्षामला, निश्चन्द्राभ्रकशुद्धगन्धकरसानेकीकृतान्भावयेत् । निर्गुण्डीयुगभृंगराजकवृषापामार्गपत्रोल्लसत्, प्रत्येकं स्वरसेन सिद्धवटिका घ्नन्ति त्रिदोषोदयम्८६ येषां शीतमतीव देहमखिलं स्वेदद्रवार्द्रीकृतं, निद्रा घोरतरा समस्तकरणव्यामोहमूढं मनः । शूलं श्वासबलासकाससहितं मूर्च्छारुचिं तृड्ज्वरं, तेषां वैपरिहृत्य जीवितमसौ गृह्णाति मृत्योर्मुखात्८७ सुहागा, विष, जीरा, पांचों लवण, त्रिकुटा, हरड, बहेडा, आमला, अभ्रक भस्म, गंधक और पारा यह सब द्रव्य समान भाग लेकर सम्हालू, भांगरा, काला भांगरा, अडूसा और चिरचिटा इन सबके पत्तोंके रसमें अलग अलग खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। यह गोली त्रिदोषजनित रोगोंको नष्ट करती है । जिन मनुष्योंके शरीरमें अतीव शीत व्याप्त हो गया हो तथा जिनका शरीर अत्यंत पसीनेसे भीज रहा हो, जो अतीव घोरतर निद्रासे विह्वल हो, जिनकी समस्त इन्द्रियें विकल और जिनका मन मुग्ध होगया हो उनको यह औषधि सेवन करनेसे शूल, श्वास, कफ, खाँसी, मूर्च्छा, अरुचि, तृषा और ज्वर नष्ट कर मृत्युके मुखसे भी बचा देती है ॥ ८६ ॥ ८७ ॥

भाषाटीकासहित । ( १४७ ) सन्निपातहर रस । सूतं गंधं टंकणं वै मरीचं व्योषं तद्वद्धस्तिनः पिप्पली च । सर्वं तुल्यं धूर्तनीरैः प्रपेष्य व्योष- क्षोदैर्कनीरैर्द्विगुञ्जम् ॥ ८८ ॥ पारा, गंधक, सुहागा, कालीमिरच, गजपीपल और त्रिकुटा यह सब औषधि समानभाग लेकर एकत्र धतूरेके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको आकके क्वाथ और त्रिकुटेके चूर्णके साथ सेवन करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ८८ ॥ सन्निपात वडवानल रस । रसस्याष्टौ सप्त विषात् षट् षड् गन्धालयोस्तथा । दन्तीबीजानि षड् भागाः पंचभागन्तु टङ्कणम्॥८९॥ चत्वारि धूर्तबीजस्य त्रयस्त्रिकटुकस्य च । एतानि वह्निमूलस्य क्वाथेन परिमर्दयेत् ॥ ९० ॥ आर्द्रकस्य रसेनाथ देयं गुंजाद्वयं हितम् । वडवानलसंज्ञोऽयं सन्निपातहरः परः ॥ ९१ ॥ पारा ८ भाग, विष ७ भाग, गन्धक ६ भाग, हरिताल ६ भाग, जमालगोटे ६ भाग, सुहागा ५ भाग, धतूरेके बीज ४ भाग और त्रिकुटा ३ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र चीतेके क्वाथमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इन गोलियोंको अदरखके रसके साथ सेवन करे । यह वडवानल रस सन्निपातज्वरको नष्ट करता है॥८९-९१॥ सिंहनाद रस । लोहपात्रगते गन्धे द्राविते तत्र निक्षिपेत् । शुद्धसूतं समं चाभ्रं भार्गीद्रावं तयोः समम् ॥ ९२ ॥ निर्गुण्डयाः पल्लवोत्थञ्च तुल्यं तुल्यं प्रदापयेत् । पचेन्मृद्वग्निना तावद्यावच्छुष्कं द्रवं द्वयम् ॥९३॥

' or 'द्व'? Wait, look at 'द्व' in line 19: 'वल्लद्वयं'. In 'वल्लद्वयं', 'द्व' has द् on top, व below. In line 21, the letter after या has द् on top, and... wait! Could it be: या (yaa) द्व (dva) भ (bha)? Wait, look at the letters:

  1. या
  2. द्
  3. वे
  4. द्दुः Wait, could it be: या + द् + भ + वे + द्दुः ? Wait, if it's "यावद्भवेद्दुःसहशीत-", how did the typesetter typeset it? Could the typesetter have dropped 'व' and set "याद्भवेद्दुःसहशीत-"? Look at the character after 'वे': Could it be 'द्दुः'? YES! In many old fonts, 'द्दु' (द् + दु) was a ligature: द् on top of दु! When द् is placed on top of दु, the top द् has a small belly, the lower दु has a loop, looking just like a 'ह'! Yes! द् + दु = द्दु! And before 'सह' there is visarga 'ः', making it 'द्दुः'! So it IS "द्दुः"! And what is the letter between या and वे? It's 'द्भ'! So the types

भाषाटीकासहित । ( १४९ ) पारा १ भाग, गन्धक २ भाग इन दोनोंको एकत्र खरल कर ले, पश्चात् इसमें पारे और गन्धकसे चौथाई भाग तांबाभस्म, रूपाभस्म और सुवर्णकी भस्म मिलाकर तीन दिन तक चित्रकके रसमें धूपमें खरल करे, फिर इसमें आधा भाग विष मिलाकर फिर मछलीके पित्तकी भावना देवे; फिर इसको चित्रक क्वाथ और त्रिकुटेकी भावना देकर धूपमें सुखा लेवे। इस औषधिको छः ६ रत्ती परिमाण लेकर चित्रकके क्वाथ और त्रिकुटेके चूर्णके अनुपानके साथ सेवन करे। इस औषधिका सेवन कराकर रोगीके सम्पूर्ण शरीरमें तैल मर्दन करके शीतल जलसे स्नान करावे। जबतक रोगीको अत्यंत शीत नहीं लगे, मल मूत्रकी प्रवृत्ति नहीं होय और शरीर कांपने नहीं लगे तब- तक रोगीको शीतल जलमें रखना चाहिये। रोगीको क्षुधाके लगनेपर मरिच, शर्करा, दही, अन्न देवे । तथा बहुत थोड़ा अदरख, मछली और अन्य शाकके साथ भोजन करावे, दूसरे दिन फिर उसी प्रकार स्नान करावे। इसको सन्निपात सूर्य कहते हैं ॥ ९५-९८ ॥ स्वच्छन्दनायक रस । सूतगन्धकलोहानि रौप्यं संमर्दयेत् त्र्यहम् । सूर्यावर्त्तश्च निर्गुण्डी तुलसी गिरिकर्णिका ॥ ९९ ॥ अग्निवल्ल्यार्द्रकं वह्निर्विजयाथ जया सह । काकमाचीरसैरेषां पञ्चपित्तैश्च भावयेत् ॥ २०० ॥ अन्धमूषागतं पश्चाद्वालुकायन्त्रगं दिनम् । विपचेच्चूर्णितं खादेन्माषैकं चार्द्रकद्रवैः ॥ २०१ ॥ निर्गुण्डीदशमूलानां कषायं सोषणं पिबेत् । अभिन्यासं निहन्त्याशु रसः स्वच्छन्दनायकः ॥ छागीदुग्धेन मुद्रं वा पथ्यमत्र प्रयोजयेत् ॥२०२॥

( १५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मायूरमात्स्यवाराहच्छागमाहिषमेव च । पञ्चपित्तमिदं देयं भावनासु च सर्वदा ॥ २३० ॥ इसके उपरान्त अभिन्यास ज्वरकी चिकित्सा कहते हैं। पारा, गन्धक, लोहेकी भस्म, रूपाभस्म इन सबको एकत्र करके हुलहुल, सम्भालू, तुलसी, गिरिकर्णिका, कलिहारी, अदरख, चित्रक, जयन्ती, भांग और मकोय इन प्रत्येकके रसमें तीन दिन तक और पांच प्रकारके पित्तोंमें तीन दिन उत्तम विधिसे खरल करके भावना देवे । फिर अन्धमूषामें बन्द करके एक दिन वालुकायन्त्रमें पकाकर चूर्ण कर लेवे । यह १ मासे औषधि अदरखके रसके साथ सेवन करे और ऊपरसे सम्हालू और दशमूलके क्वाथमें काली मिरचोंका चूर्ण मिला- कर अनुपान करे । इसको स्वच्छन्दनायक रस कहते हैं। इस औषधिके सेवन करनेसे अभिन्यास ज्वर शीघ्र नष्ट होजाता है । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् बकरीका दूध और मूंगका यूष पथ्य देवे । मोर, मछली, सुअर, बकरा और भैंस इन पांच जीवोंके पित्तको पञ्चपित्त कहते हैं । भावनाकार्यमें ये ही पांच पित्त लिये जाते हैं १९९-२०३॥ सन्निपातान्तक रस । शुद्धसूतः समो गन्धो दरदं शुद्धखर्परम् । रसस्य द्विगुणौ देयौ मृतताम्राम्लवेतसौ ॥ २०५ ॥ भृङ्गराजद्रवैर्भाव्यं प्रत्यहं भावना पृथक् । दातव्यं तच्चतुर्गुञ्जामार्द्रकस्य रसैः सह । सन्निपातं निहन्त्याशु सन्निपातान्तको रसः२०४ शुद्ध पारा, गन्धक, सिंग्रफ और खपरिया यह सब एक एक भाग तथा पारेसे दो गुनी तांबेकी भस्म और अमलवेत इन सबको भांगरेके रसमें सात भावना देवे । इसकी चार रत्तीकी मात्रा है । अदरखके रसके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे शीघ्र ही सन्निपात ज्वर नष्ट होजाता है । इसको सन्निपातान्तक रस कहते हैं ॥ २०४ ॥ २०५ ॥

भाषाटीकासहित । ( १५१ ) अथ जीर्णज्वर विषमज्वर चिकित्सा । अथ विषमज्वर लक्षण । यः स्यादनियतात्कालाच्छीतोष्णाभ्यां तथैव च । वेगतश्चापि विषमः स ज्वरो विषमः स्मृतः॥२०६॥ जिस ज्वरमें ज्वरके आगमनका समय अनियमत हो, तथा शीत और उष्णता भी अनियत हो और ज्वर कभी समान स्थितिमें स्थित नहीं होय उसको विषमज्वर कहते हैं ॥ २०६ ॥ जीर्णज्वरके लक्षण । त्रिसप्ताहव्यतीतस्तु ज्वरो यस्तनुतां गतः । प्लीहाग्निसार्दं कुरुते स जीर्णज्वर उच्यते ॥ २०७ ॥ इक्कीस २१ दिन तक भी जो ज्वर नहीं पके किंतु सूक्ष्म होजाये तथा मंदाग्नि और प्लीहा आदि रोग उत्पन्न होजायँ तो उसको जीर्णज्वर कहते हैं ॥ २०७ ॥ ज्वरांकुश रस । रसस्य द्विगुणं गन्धं गन्धतुल्यञ्च टंकणम् । रसतुल्यं विषं योज्यं मरिचं पंचधा विषात्॥२०८॥ कट्फलं दन्तिबीजञ्च प्रत्येकं मरिचोन्मितम् । ज्वरांकुशो रसो नाम मर्दयेद्याममात्रकम् । माषेकेन निहन्त्याशु ज्वरं जीर्णं त्रिदोषजम्॥२०९॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, सुहागा २ भाग, विष १ भाग, काली मिरच, कायफल और जमालगोटे यह तीनों पांच पांच भाग, इन सबको एकत्र करके एक प्रहर तक खरल करे । इस औषधिके १ मासा सेवनसे त्रिदोषज जीर्णज्वर नष्ट होता है । इसको जीर्णज्वरां- कुश रस कहते हैं ॥ २०८-२०९ ॥

( १६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ज्वरारि अभ्रक । अभ्रं ताम्रं रसं गन्धं विषञ्चैव समं समम् ॥२१०॥ द्विगुणं धूर्त्तबीजञ्च व्योषं पञ्चगुणं मतम् । आर्द्रकस्य रसेनैव वटी कार्या द्विगुंजिका ॥ ११ ॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं यथादोषानुसारतः । अभ्रं ज्वरारिनामेदं सर्वज्वरविनाशनम् । वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम्॥१२॥ विषमाख्याञ्ज्वरान्सर्वान्धातुस्थान्विषमज्वरान् । प्लीहानं यकृतं गुल्ममग्रमांसं सशोथकम् ॥ १३ ॥ हिक्कां श्वासञ्च कासञ्च मन्दानलमरोचकम् । नाशयेन्नात्र सन्देहो वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा ॥ १४ ॥ अभ्रकभस्म, तांबेकी भस्म, पारा, गंधक और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, धतूरेके बीज दो भाग और त्रिकुटेका चूर्ण पांच भाग इन सबको एकत्र अदरखके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । रोगीके बलाबलको विचार कर अनुपानकी व्यवस्था करके औषधि सेवन करावे । इसको ज्वरारि अभ्रक कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे वातज, पित्तज, श्लैष्मिक और सन्निपातिक ज्वर, सर्वधातुगत विषम ज्वर, प्लीहा, यकृत, गुल्म, अग्रमांस, शोथ, हिक्का, श्वास, खांसी, मंदाग्नि और अरुचि रोग निश्चय नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार वज्रसे वृक्षोंके समूह तत्काल नष्ट होजाते हैं इसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे उपरोक्त रोग शीघ्र ही नष्ट होजाते हैं ॥ २१०–२१४ ॥ ज्वराशनि रस । रसं गन्धं सैन्धवञ्च विषं ताम्रं समांशकम् । सर्वचूर्णसमं लौहं तत्समं शुद्धमभ्रकम् ॥ १५ ॥

भाषाटीकासहित । ( १५३ ) लौहे च लौहदण्डेन निर्गुण्डीस्वरसेन च । मर्दयेद्यत्नतः पश्चान्मरिचं सूततुल्यकम् ॥ १६ ॥ नागवल्ल्या दलेनैव दातव्यो रक्तिसम्मितः । सर्वज्वरहरः श्रेष्ठो ज्वरान् हन्ति सुदारुणान् ॥ १७ ॥ कासं श्वासं महाघोरं विषमाख्यं ज्वरं वमिम् । धातुस्थं परमं दाहं ज्वरं दोषत्रयोद्भवम् ॥ १८ ॥ पारा, गंधक, सेंधानमक, विष और तांबेकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्म पांच भाग, अभ्रक भस्म पांच भाग इन सब औषधियोंको एकत्र लोहेके खरलमें डालकर सम्हालूके रसमें लोहेके डंडेसे खरल करे । फिर इसमें एक भाग काली मिर- चोंका चूर्ण मिलाकर खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिका पानके रसके साथ रोगीको सेवन करावे । इसके सेवन करनेसे दारुण त्रिदोष ज्वर, विषमज्वर, सब प्रकारके ज्वर, खाँसी, श्वास, वमन, धातुस्थ ज्वर और दाह नष्ट होते हैं। इसको ज्वराशनि रस कहते हैं ॥ १६-१८ ॥ अर्द्धनारीश्वर रस । रसगन्धौ समौ शुद्धौ विषं ग्राह्यञ्च तत्समम् । जैपालं तत्समं ग्राह्यं मरिचञ्च चतुर्गुणम् ॥ १९ ॥ त्रिफलाया रसैर्मर्द्यं भावना पञ्चधा तथा । जम्बीराणां द्रवैर्नस्यमेकस्मिन्नासिकापुटे ॥ २२० ॥ शरीरार्द्धगतं घोरं ज्वरं हन्ति न संशयः । अर्द्धनारीश्वरो नाम रसः शम्भुप्रकीर्तितः ॥ २१ ॥ पारा और गंधक एक एक भाग, विष दो भाग, जमालगोटे दो भाग और कालीमिरच चार भाग इन सब औषधियोंको त्रिफलेके

( १५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रसमें पांच भावना देवे ! इस औषधिको जम्भीरी नींबूके रसमें भिगो- कर एक ओरकी नासिकाके छिद्रमें नास देनेसे अर्द्धशरीरगत घोरतर ज्वर नष्ट होजाता है । इसको अर्द्धनारीश्वर रस कहते हैं । इसको स्वयं महादेवने कहा है ॥ १९-२१ ॥ चन्दनादिलोह । रक्तचन्दनह्रीबेरपाठोशीरकणा शिवा । नागरोत्पलधात्रीभित्रिमदेन समन्वितम् ॥ लोहं निहन्ति विविधान्समस्तान्विषमज्वरान्॥२२॥ लाल चंदन, सुगंधवाला, पाठ, खस, पीपल, हरड़, सोंठ, नीलोफर, आमले, वायविडंग, चीता और नागरमोथा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहेकी भस्म १२ भाग इन सबको एकत्र करके सूक्ष्म चूर्ण बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे विषमज्वर नष्ट होता है । इसको चन्दनादि लोह कहते हैं ॥ २२ ॥ ज्वरारि रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं विषञ्चैव कटुत्रयम् । नागभस्म शिला चैव प्रत्येकं कर्षमानकम् ॥२३॥ शुद्धतालार्द्धकर्षञ्च शुल्वमेकत्र कारयेत् । धूस्तूरस्य च बीजानि कार्षिकाणि प्रकल्पयेत्॥२४॥ रोहितमत्स्यपित्तेन अर्कक्षीरार्द्रकाम्बुना । मर्दयेदुदयास्तञ्च चणकाभा वटी कृता ॥ २५ ॥ पारा दो भाग, गंधक चार भाग, विष ४ भाग, विषके समान त्रिकुटेका चूर्ण, नागभस्म और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग, हरितालभस्म एक भाग, तांबेकी भस्म एक भाग और धतूरेके बीज दो भाग इन सबको रोहूमछलीके पित्तेमें, अदरखके रसमें और आकके दूधमें एक दिन तक खरल करके चणेकी बराबर गोली बना लेवे ॥ २३-२५ ॥

भाषाटीकासहित । ( १५५ ) आर्द्रकस्य रसैः कर्षैर्मधु माषसमायुतम् । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय ज्वरारिरससंज्ञितम् ॥ २६ ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव कफजं नाशयेद् ध्रुवम् । वातपित्तसमुद्भूतं वातश्लैष्मिकमेव च ॥ २७ ॥ भयोत्पत्तिकमेवापि शोकोत्पन्नमथापि वा । अभिचाराभिशापोत्थं भूतोत्थञ्च ज्वरं जयेत्॥२८॥ मेदःप्राप्तं सन्ततं च रसस्थं तु ज्वरं तथा । सन्निपातज्वरे देयो मधुव्योषसमायुतः ॥ २९ ॥ घर्मं पित्तं तथा कम्पं दाहं हन्ति न संशयः । इन्द्रवज्रं तथा वृक्षं तथा ज्वरविनाशनः ॥२३०॥ प्रातःकाल मुख धोकर एक तोले अदरखके रसके साथ और एक मासे शहदके साथ सेवन करे । इसको ज्वरारिरस कहते हैं । इस औषधिको उक्त अनुपानके साथ सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, भयज्वर, शोकज्वर, अभिचार- जनित, शापजनित, भूतोत्पन्न, सन्तत, मेदोगत और रसस्थ ज्वर दूर होता है । इस औषधिका शहद और त्रिकुटके चूर्णके साथ सन्निपात ज्वरमें प्रयोग करे । इस औषधिके सेवन करनेसे निश्चय ही ज्वर शमन होता है, घर्म्म, कम्प और दाह दूर होते हैं । जिस प्रकार वज्रके गिरनेसे वृक्षोंके समूह नष्ट होजाते हैं उसीप्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारके ज्वर नष्ट होजाते हैं ॥ २२६-२३० ॥ वर्जयेत्क्षीरं मांसं च दधि तक्रं सुरां घृतम् । ज्वरे मांसास्थिगे चैव रक्तस्थे तु ज्वरे नृणाम्॥३१॥ शैत्ये दाहे तथा घर्मे प्रलापे चातुराह्निके । महावेगे ज्वरे चैव जीर्णज्वरे प्रदापयेत् ॥ ३२ ॥

( १६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इस औषधिके ऊपर दूध, मांस, दही, तक्र, मदिरा और घृतको त्याग देवे । मांसगत, अस्थिगत, रक्तज्वर, शीतज्वर, दाहज्वर, घर्म्म, प्रलाप, चातुर्थिकज्वर, महावेगवान् ज्वर और जीर्णज्वर इन सबमें इसका प्रयोग करे ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ सर्वज्वरहर लोह । चित्रकं त्रिफला व्योषं विडङ्गं मुस्तकं तथा । श्रेयसी पिप्पलीमूलमुशीरं देवदारु च ॥३३॥ किराततिक्तकं पाठा कटुकी कण्टकारिका । शोभाञ्जनस्य बीजानि मधुकं वत्सकैः समम् ॥३४॥ लोहतुल्यं गृहीत्वा तु वटिकां कारयेद्भिषक् । सर्वज्वरहरं लौहं सर्वरोगहरन्तथा ॥ ३५ ॥ चित्रकमूल, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडंग, नागरमोथा, गजपीपल, पीपलीमूल, खस, देवदारु, चिरायता, पाठ, कुटकी, कटेरी, सुहांजनके बीज, मुलैठी और कुड़ेके बीज यह सब वस्तु समान भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेकर गोलियां बना लेवे । इसको सर्वज्वरहर लोह कहते हैं । यह औषधि सब प्रकारके रोगोंको दूर करती है ३३-३५ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सन्निपातिकम् । द्वन्द्वजं विषमार्थं च धातुस्थं च ज्वरञ्जयेत् ॥३६॥ शीतं कम्पं तृषादाहं घर्मस्रुतिवमिभ्रमीन् । रक्तपित्तमतीसारं मंदाग्निं कासमेव च ॥ ३७ ॥ प्लीहानं यकृतं गुल्मं सामवातं सुदारुणम् । अर्शांसि घोरमुदरं मूर्च्छा पाण्डुं हलीमकम् ॥३८॥ अजीर्णं ग्रहणीं चैव यक्ष्माणं शोथमेव च ।

भाषाटीकासहित । ( १५७ ) बल्यं वृष्यं पुष्टिकरं सर्व्वरोगनिषूदनम् । सर्व्वज्वरहरं लौहं चन्द्रनाथेन भाषितम् ॥ ३९ ॥ इस औषधिके सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपा- तिक, द्वन्द्वज, विषम और धातुस्थज्वर तथा शीत, कम्प, तृषा, दाह, पसीना, वमन, भ्रम, रक्तपित्त, अतिसार, मन्दाग्नि, खाँसी, प्लीहा, यकृत्, गुल्म, दारुण आमवात, अर्श, घोरतर उदररोग, मूर्छा, पांडु, हलीमक, अजीर्ण, ग्रहणी, यक्ष्मा और शोथरोग ये नष्ट होते हैं। यह सर्व्वज्वरहर लोह अत्यंत बलकारक, शुक्रवर्द्धक, पुष्टिकारक और सर्व्वरोगनाशक है। यह चन्द्रनाथने कहा है ॥ ३६-३९ ॥ बृहत्सर्व्वज्वरहर लोह । पारदं गंधकञ्चैव ताम्रमभ्रञ्च माक्षिकम् । हिरण्यं तारतालञ्च कर्षमेकं पृथक् पृथक् ॥ ४० ॥ कान्तलोहं पलं देयं सर्वमेकीकृतं शुभम् । वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं दिनसप्तकम् ॥ ४१ ॥ कारवेल्लरसैर्वापि दशमूलरसेन च । पर्पट्याश्च कषायेण त्रिफलाक्वाथकेन वा ॥ ४२ ॥ गुडूच्याः स्वरसेनैव नागवल्लीरसेन च । काकमाचीरसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसैस्तथा ॥ ४३ ॥ पुनर्नवार्द्रकाम्भोभिर्भावनाः परिकीर्त्तिताः । रक्तिकादिक्रमेणैव वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ४४ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म, सोनामाखीभस्म, सुवर्णभस्म, रूपाभस्म, शुद्ध हरितालभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला और कान्तलोहभस्म चार तोले लेवे. इन सबको एकत्र करके करेला, दशमूल, पित्तपापडा, त्रिफला, गिलोय, पान, मकोय, सम्हालू,

( १५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पुनर्नवा और अदरख इन प्रत्येकके रसमें सात सात वार भावना देवे और एक एक रत्तीकी गोलियां बना लेवे ॥ २४०-२४४ ॥ गुडपिप्पलिसंयुक्ता वटिका ज्वरनाशिनी । ज्वरमष्टविधं हन्ति जीर्णज्वरमथापि च ॥ ४५ ॥ वारिदोषोद्भवञ्चैव नानादोषोद्भवं तथा । सततादिज्वरं हंति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ ४६ ॥ क्षयोद्भवञ्च धातुस्थं कामशोकभवं तथा । भूतावेशभवञ्चैव त्रिदोषजनितं तथा ॥ ४७ ॥ अभिघातज्वरञ्चैव तथाभीचारसंभवम् । अभिन्यासं महाघोरं विषमं ड्याहिकं तथा ॥ ४८ ॥ शीतपूर्वं दाहपूर्वं त्रिदोषं विषमज्वरम् । प्रलेपकज्वरं घोरमर्द्धनारीश्वरं तथा ॥ ४९ ॥ प्लीहज्वरं तथा कासं चातुर्थिकविपर्ययम् । पाण्डुरोगं कामलाञ्च अग्निमांद्यं महागदम् ॥ २५०॥ एतान्सर्वान्निहंत्याशु पक्षाद्धैंन न संशयः । शाल्यन्नं तक्रसहितं भोजयेद्विडसंयुतम् ॥ ५१ ॥ ककारपूर्वकं सर्वं वर्जनीयं न संशयः । मैथुनं वर्जयेत्तावद्यावन्न बलवान् भवेत् । सर्वज्वरहरं लौहं दुर्लभं परिकीर्त्तितम् ॥ ५२ ॥ एक गोली गुड़ और पीपलके चूर्णके साथ सेवन करनेसे आठ प्रकारका ज्वर नष्ट होता है। यह औषधि जीर्णज्वर, जलदोषजनित तथा अन्यान्य दोषजनित सततादिज्वर, साध्य असाध्य क्षयज धातुस्थ कामज शोकज भूतावेशज त्रिदोषजज्वर, अभिघात ज्वर, अभिचार- सम्भव ज्वर, घोरतर अभिन्यासज्वर, त्र्याहिकज्वर, शीतज्वर, दाहपूर्वक

भाषाटीकासहित । ( १५९ ) ज्वर, सन्निपातज्वर, विषमज्वर, प्रलेपक ज्वर, घोरतर अर्द्धनारीश्वर- ज्वर, प्लीहज्वर, चातुर्थिक ज्वर, विपर्ययज्वर तथा ज्वर खाँसी, पाण्डु, कामला और मंदाग्नि प्रभृति समस्त उत्कट रोग केवल एक सप्ताहमें दूर होजाते हैं । इस औषधिका सेवन करके शालिचावलोंका भात, विडनमक और तक्रके साथ भोजन करे और ककोड़ा, करेला, कद्दू, ककड़ी आदि ककारादिगणकी सब वस्तु त्याग देवे और जबतक रोगी बलवान् न हो तबतक स्त्रीका संभोग त्याग देवे । इस दुर्लभ लोहको बृहत्सर्वज्वरहर लोह कहते हैं ॥ ४५-५२ ॥ महाराजवटी । रसगंधकमभ्रञ्च प्रत्येकं कर्षसम्मितम् । वृद्धदारकवङ्गञ्च लौहं कर्षार्द्धकं क्षिपेत् ॥ ५३ ॥ स्वर्णं ताम्रं च कर्पूरं प्रत्येकं कर्षपादिकम् । शक्राशनं वरी चैव श्वेतसर्जंलवंगकम् ॥ ५४ ॥ कोकिलाक्षं विदारी च मूसली शूकशिंबिकम् । जातीफलं तथा कोषं बला नागबला तथा ॥५५॥ माषद्वयमितं भागं तालमूल्या रसेन च । पिष्ट्वा च वटिका कार्या चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ॥५६॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला; विधारा, वंगभस्म और लोहभस्म यह प्रत्येक ६-६ मासे; सुवर्णभस्म, कपूर और तांबाभस्म यह प्रत्येक तीन तीन मासे; भांग, सतावर, सफेद राल, लौंग, तालमखाना, विदारीकन्द, मुसली, कौंचके बीज, जायफल, जावित्री, खिंरेंटी और गंगेरन यह प्रत्येक औषधि दो दो मासे लेवे, इन सबको एकत्र करके मुसलीके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे ॥ ५३-५६ ॥

( १६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मधुना भक्षयेत्प्रातर्विषमज्वरशांतये । धातुस्थांश्च ज्वरान्सर्वान्हन्यादेव न संशयः ॥५७॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । ज्वरं नानाविधं हंति कासं श्वासं क्षयन्तथा ॥५८॥ बलपुष्टिकरं नित्यं कामिनीं रमयेत्सदा । न च शुक्रक्षयं याति न बलं ह्रासतां व्रजेत् ॥५९॥ ऊर्ध्वंगं श्लेष्मजं हन्ति सन्निपातं सुदारुणम् । कामलां पांडुरोगञ्च प्रमेहं रक्तपित्तकम् ॥ महाराजवटी ख्याता राजयोग्या च सर्वदा ॥२६०॥ इस औषधिको शहदके साथ सेवन करनेसे विषमज्वर नष्ट होता है तथा सब प्रकारके ज्वर, धातुगतज्वर, वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक प्रभृति अनेक प्रकारके ज्वर खाँसी, श्वास और क्षय रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे बलकी वृद्धि होती है, शरीर पुष्ट होता है और सदैव स्त्रीके साथ प्रसंग करनेसे भी वीर्य क्षीण नहीं होता है, तथा दारुण कफोल्बण सन्निपात, कामला, पांडुरोग, प्रमेह और रक्तपित्त नष्ट होता है । इसको महाराजवटी कहते हैं । यह राजाओंको सेवन करनी उचित है ॥ २५७-२६० ॥ चिन्तामणि रस । हाटकं रजतं तालं मुक्ता गन्धकपारदौ । त्रिकटु कुनटी चैव कस्तूरी च पृथक् पृथक् ॥६१॥ जलेन वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । चिन्तामणिरसो ह्येष ज्वराष्टानां निकृन्तनः ॥६२॥ सुवर्णभस्म, रूपाभस्म, शुद्ध हरिताल भस्म, मोती भस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, त्रिकुटा, मैनशिल और कस्तूरी यह सब औषधि समान भाग

भाषाटीकासहित । ( १६१ ) लेकर जलसे दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। इसको चिन्तामणि रस कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे आठ प्रकारका ज्वर नष्ट होता है ॥ ६१ ॥ ६२ ॥ त्रैलोक्यचिन्तामणि रस । भागत्रयं स्वर्णभस्म द्विभागं तारमभ्रकम् । लोहात्पञ्च प्रवालञ्च मौक्तिकत्रयसम्मितम् ॥ ६३ ॥ भस्मसूतं सप्तकञ्च सर्वं मर्द्यं तु कन्यया । छायाशुष्का वटी कार्या छागीदुग्धानुपानतः ॥६४॥ क्षयं हन्ति तथा कासं गुल्मं चापि प्रमेहनुत् । जीर्णज्वरहरश्चायमुन्मादन्तु निकृन्तति ॥ सर्वरोगहरश्चापि वारिदोषनिवारणः ॥ ६५ ॥ सोनाभस्म ३ भाग, चांदीभस्म २ भाग, अभ्रकभस्म २ भाग, लोहभस्म ५ भाग, मूंगा भस्म ५ भाग, मोती भस्म ३ भाग और रससिन्दूर या पारद भस्म सात भाग इन सब औषधियोंको एकत्र घृत- कुमारी ( घीक्वार ) के रसमें उत्तम रीतिसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना छायामें सुखा लेवे । इस औषधिको बकरीके दूधके साथ सेवन करनेसे क्षय, खाँसी, गुल्म, प्रमेह, जीर्णज्वर, उन्माद, वारिदोष आदि समस्त रोग नष्ट होते हैं । इसको त्रैलोक्यचिन्तामणि रस कहते हैं ॥ ६३–६५ ॥ रसं गन्धं विषञ्चैव त्रिकटु त्रैफलन्तथा । शिलाह्वा रौप्यकं स्वर्णं मौक्तिकं तालकं समम्॥६६॥ मृगकस्तूरिकायाश्च ग्राह्यं षाण्माषिकं भिषक् । भृङ्गराजरसेनैव तुलस्याः स्वरसेन वा ॥ ६७ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जिकाम् । चिन्तामणिरसो ह्येष सर्वरोगकुलान्तकः ॥ ६८ ॥

( १६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । संनिपातज्वरहरः कफरोगं विनाशयेत् । एकजं द्वन्द्वजञ्चैव विविधं विषमज्वरम् ॥ ६९ ॥ अग्निमांद्यं शिरःशूलं विद्रधिं सभगन्दरम् । एतान्येव निहंत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥२७०॥ पारा, गन्धक, विष, त्रिकुटा, त्रिफला, मैनशिल, रूपाभस्म, सोना- भस्म, मोतीभस्म और हरितालभस्म यह सब प्रत्येक एक एक तोला, कस्तूरी छः मासे इन सबको एकत्र करके भांगरे, तुलसी और अदरखके रसमें अलग अलग भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । (कस्तूरी भावना देनेके बाद डालना चाहिये) इसको बृहच्चिन्तामणि रस कहते हैं । यह सब रोगोंको नष्ट करता है। जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्ध- कारका समूह नष्ट होजाता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे सन्निपात ज्वर, कफज रोग, एकदोषज और द्वन्द्वज ज्वर, विविध प्रकारके विषमज्वर, मंदाग्नि, शिरःशूल, विद्रधि और भगन्दररोग नष्ट होते हैं ॥ २६६-२७० ॥ विषमज्वरान्तक लोह । हिङ्गूलसम्भवं सूतं गन्धकेन सुकज्जलम् । रसपर्पटिवत्पाच्यं सूतांघ्रिहेमभस्मकम् ॥ ७१ ॥ लौहं ताम्रमभ्रकञ्च रसस्य द्विगुणं क्षिपेत् । वङ्गञ्चैव प्रवालञ्च रसार्द्धञ्च विनिःक्षिपेत् ॥ ७२ ॥ मुक्ता शङ्खं शुक्तिभस्म रसपादिकमेव च । मुक्तागृहे च संस्थाप्य पुटपाकेन साधयेत् ॥ ७३ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय द्विगुञ्जाफलमानतः । अनुपानं प्रयोक्तव्यं कणा हिङ्गु ससैन्धवम् ॥ ७४ ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा और गन्धक इन दोनोंकी एकत्र कजली बनाकर पर्पटीके समान पका लेवे। ऐसे उपरोक्त पर्पटी एक

भाषाटीकासहित । ( १६३ ) भाग, सुवर्णभस्म पारदसे चतुर्थांश ( चौथाई भाग ), लोहाभस्म, तांबाभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक पारेसे दो दो भाग, वंगभस्म और प्रवाल ( मूंगा ) भस्म प्रत्येक पारेसे अर्द्ध भाग; मोती, शंख और सीपकी भस्म प्रत्येक पारेसे चौथाई भाग इन सबको एकत्र करके एक सीपमें भरकर पुटपाककी विधिसे पकावे । प्रातःकाल उठकर दो दो रत्तीप्रमाण इस औषधिका पीपलके चूर्ण, हींग और सेंधानमकके साथ सेवन करे ॥ ७१-७४ ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति वातपित्तकफोद्भवम् । प्लीहानं यकृतं गुल्मं साध्यासाध्यमथापिवा ॥ ७५ ॥ संततं सतताख्यञ्च त्र्याहिकं चातुराह्निकम् । कामलां पाण्डुरोगञ्च शोथं मेहमरोचकम् ॥ ७६ ॥ ग्रहणीमामदोषञ्च कासं श्वासञ्च दारुणम् । मूत्रकृच्छ्रातिसारञ्च नाशयेदविकल्पतः ॥ ७७ ॥ इस औषधिके सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक और श्लैष्मिकादि अष्टविध ज्वर, सन्तत, सतत, त्र्याहिक और चातुर्थिक ज्वर, प्लीहा, यकृत् रोग, साध्यासाध्य गुल्म, कामला, पाण्डु, सूजन, प्रमेह, अरुचि, संग्रहणी, आमाशयगत रोग, दारुण कास, श्वास, मूत्रकृच्छ्र और अतिसार शीघ्र ही नष्ट होजाते हैं । इसको विषमज्वरान्तक लोह कहते हैं ॥ ७५-७७ ॥ बृहद्विषमज्वरान्तक लोह । शुद्धसूतं तथा गन्धं कारयेत्कज्जलीं शुभाम् । मृतसूतं हेमतारं लौहमभ्रञ्च ताम्रकम् ॥ ७८ ॥ तालसत्त्वं वङ्गभस्म मौक्तिकं सप्रवालकम् । सुवर्णमाक्षिकञ्चापि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ७९ ॥ निर्गुण्डी नागवल्ली च काकमाची सपर्पटी । त्रिफला कारवेल्लञ्च दशमूली पुनर्नवा ॥८०॥

( १६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गुडूची वृषकश्चापि सभृङ्गकेशराजकः । एतेषाञ्च रसेनैव भावयेत्त्रिदिनं पृथक् ॥ ८१ ॥ प्रथम शुद्ध पारे और गंधकको खरल करके कज्जली बना लेवे और फिर इस कज्जलीकी बराबर रससिन्दूर या पारद भस्म, सुवर्णभस्म, रूपाभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, तांबेकी भस्म, हारिताल भस्म, वंग- भस्म, मोती, मूंगा और सोनामाखीकी भस्म यह सब द्रव्य समान लेकर एकत्र चूर्ण करके सम्हालू, पान, मकोय, पित्तपापड़ा, त्रिफला, करेला, दशमूल, पुनर्नवा, गिलोय, अडूसा, भांगरा और कुकुरभांगरा इन प्रत्येकके रसमें तीन दिन तक अलग अलग भावना देवे॥२७८-२८१॥ गुञ्जामात्रां वटीं कुर्याच्छास्त्रवित्कुशलो भिषक् । पिप्पलीगुडकेनैव लिहेच्च वटिकां शुभाम् ॥८२॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति निरामं साममेव वा । सप्तधातुगतञ्चापि नानादोषोद्भवं तथा ॥ ८३ ॥ सततादिज्वरं हंति साध्यासाध्यमथापिवा । अभिघाताभिचारोत्थं जीर्णज्वरं विशेषतः ॥ ८४ ॥ पश्चात् कार्यमें दक्ष वैद्य इसकी एक एक रत्तीकी गोली बनालेवे । इन गोलियोंको पीपल और गुड़के साथ मिलाकर सेवन करे तो आम ( अपक्व ) और निराम ( पक्व ) अष्टविध ज्वर, सप्तधातुगत ज्वर, नानादोषोद्भव सततादि ज्वर, साध्यासाध्य अभिघात और अभिचार- जात ज्वर और विशेषकर जीर्ण ज्वर नष्ट होता है । इसको बृहद्विषम- ज्वरान्तक लोह कहते हैं ॥ ८२-८४ ॥ शीतभञ्जी रस । तालकं दरदोद्भूतपारदो गन्धकः शिला । क्रमवृद्ध्या ताम्रपात्रीं द्रवैरेतैर्विलेपयेत् ॥ ८५ ॥