भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( १६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इस औषधिके ऊपर दूध, मांस, दही, तक्र, मदिरा और घृतको त्याग देवे । मांसगत, अस्थिगत, रक्तज्वर, शीतज्वर, दाहज्वर, घर्म्म, प्रलाप, चातुर्थिकज्वर, महावेगवान् ज्वर और जीर्णज्वर इन सबमें इसका प्रयोग करे ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ सर्वज्वरहर लोह । चित्रकं त्रिफला व्योषं विडङ्गं मुस्तकं तथा । श्रेयसी पिप्पलीमूलमुशीरं देवदारु च ॥३३॥ किराततिक्तकं पाठा कटुकी कण्टकारिका । शोभाञ्जनस्य बीजानि मधुकं वत्सकैः समम् ॥३४॥ लोहतुल्यं गृहीत्वा तु वटिकां कारयेद्भिषक् । सर्वज्वरहरं लौहं सर्वरोगहरन्तथा ॥ ३५ ॥ चित्रकमूल, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडंग, नागरमोथा, गजपीपल, पीपलीमूल, खस, देवदारु, चिरायता, पाठ, कुटकी, कटेरी, सुहांजनके बीज, मुलैठी और कुड़ेके बीज यह सब वस्तु समान भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्म लेकर गोलियां बना लेवे । इसको सर्वज्वरहर लोह कहते हैं । यह औषधि सब प्रकारके रोगोंको दूर करती है ३३-३५ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सन्निपातिकम् । द्वन्द्वजं विषमार्थं च धातुस्थं च ज्वरञ्जयेत् ॥३६॥ शीतं कम्पं तृषादाहं घर्मस्रुतिवमिभ्रमीन् । रक्तपित्तमतीसारं मंदाग्निं कासमेव च ॥ ३७ ॥ प्लीहानं यकृतं गुल्मं सामवातं सुदारुणम् । अर्शांसि घोरमुदरं मूर्च्छा पाण्डुं हलीमकम् ॥३८॥ अजीर्णं ग्रहणीं चैव यक्ष्माणं शोथमेव च ।