रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १५५ ) आर्द्रकस्य रसैः कर्षैर्मधु माषसमायुतम् । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय ज्वरारिरससंज्ञितम् ॥ २६ ॥ वातिकं पैत्तिकं चैव कफजं नाशयेद् ध्रुवम् । वातपित्तसमुद्भूतं वातश्लैष्मिकमेव च ॥ २७ ॥ भयोत्पत्तिकमेवापि शोकोत्पन्नमथापि वा । अभिचाराभिशापोत्थं भूतोत्थञ्च ज्वरं जयेत्॥२८॥ मेदःप्राप्तं सन्ततं च रसस्थं तु ज्वरं तथा । सन्निपातज्वरे देयो मधुव्योषसमायुतः ॥ २९ ॥ घर्मं पित्तं तथा कम्पं दाहं हन्ति न संशयः । इन्द्रवज्रं तथा वृक्षं तथा ज्वरविनाशनः ॥२३०॥ प्रातःकाल मुख धोकर एक तोले अदरखके रसके साथ और एक मासे शहदके साथ सेवन करे । इसको ज्वरारिरस कहते हैं । इस औषधिको उक्त अनुपानके साथ सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, भयज्वर, शोकज्वर, अभिचार- जनित, शापजनित, भूतोत्पन्न, सन्तत, मेदोगत और रसस्थ ज्वर दूर होता है । इस औषधिका शहद और त्रिकुटके चूर्णके साथ सन्निपात ज्वरमें प्रयोग करे । इस औषधिके सेवन करनेसे निश्चय ही ज्वर शमन होता है, घर्म्म, कम्प और दाह दूर होते हैं । जिस प्रकार वज्रके गिरनेसे वृक्षोंके समूह नष्ट होजाते हैं उसीप्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे सब प्रकारके ज्वर नष्ट होजाते हैं ॥ २२६-२३० ॥ वर्जयेत्क्षीरं मांसं च दधि तक्रं सुरां घृतम् । ज्वरे मांसास्थिगे चैव रक्तस्थे तु ज्वरे नृणाम्॥३१॥ शैत्ये दाहे तथा घर्मे प्रलापे चातुराह्निके । महावेगे ज्वरे चैव जीर्णज्वरे प्रदापयेत् ॥ ३२ ॥