रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रसमें पांच भावना देवे ! इस औषधिको जम्भीरी नींबूके रसमें भिगो- कर एक ओरकी नासिकाके छिद्रमें नास देनेसे अर्द्धशरीरगत घोरतर ज्वर नष्ट होजाता है । इसको अर्द्धनारीश्वर रस कहते हैं । इसको स्वयं महादेवने कहा है ॥ १९-२१ ॥ चन्दनादिलोह । रक्तचन्दनह्रीबेरपाठोशीरकणा शिवा । नागरोत्पलधात्रीभित्रिमदेन समन्वितम् ॥ लोहं निहन्ति विविधान्समस्तान्विषमज्वरान्॥२२॥ लाल चंदन, सुगंधवाला, पाठ, खस, पीपल, हरड़, सोंठ, नीलोफर, आमले, वायविडंग, चीता और नागरमोथा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोहेकी भस्म १२ भाग इन सबको एकत्र करके सूक्ष्म चूर्ण बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे विषमज्वर नष्ट होता है । इसको चन्दनादि लोह कहते हैं ॥ २२ ॥ ज्वरारि रस । शुद्धसूतं द्विधा गन्धं विषञ्चैव कटुत्रयम् । नागभस्म शिला चैव प्रत्येकं कर्षमानकम् ॥२३॥ शुद्धतालार्द्धकर्षञ्च शुल्वमेकत्र कारयेत् । धूस्तूरस्य च बीजानि कार्षिकाणि प्रकल्पयेत्॥२४॥ रोहितमत्स्यपित्तेन अर्कक्षीरार्द्रकाम्बुना । मर्दयेदुदयास्तञ्च चणकाभा वटी कृता ॥ २५ ॥ पारा दो भाग, गंधक चार भाग, विष ४ भाग, विषके समान त्रिकुटेका चूर्ण, नागभस्म और मैनशिल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग, हरितालभस्म एक भाग, तांबेकी भस्म एक भाग और धतूरेके बीज दो भाग इन सबको रोहूमछलीके पित्तेमें, अदरखके रसमें और आकके दूधमें एक दिन तक खरल करके चणेकी बराबर गोली बना लेवे ॥ २३-२५ ॥