भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 584 में से

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पृष्ठ 179

भाषाटीकासहित । ( १५३ ) लौहे च लौहदण्डेन निर्गुण्डीस्वरसेन च । मर्दयेद्यत्नतः पश्चान्मरिचं सूततुल्यकम् ॥ १६ ॥ नागवल्ल्या दलेनैव दातव्यो रक्तिसम्मितः । सर्वज्वरहरः श्रेष्ठो ज्वरान् हन्ति सुदारुणान् ॥ १७ ॥ कासं श्वासं महाघोरं विषमाख्यं ज्वरं वमिम् । धातुस्थं परमं दाहं ज्वरं दोषत्रयोद्भवम् ॥ १८ ॥ पारा, गंधक, सेंधानमक, विष और तांबेकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्म पांच भाग, अभ्रक भस्म पांच भाग इन सब औषधियोंको एकत्र लोहेके खरलमें डालकर सम्हालूके रसमें लोहेके डंडेसे खरल करे । फिर इसमें एक भाग काली मिर- चोंका चूर्ण मिलाकर खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिका पानके रसके साथ रोगीको सेवन करावे । इसके सेवन करनेसे दारुण त्रिदोष ज्वर, विषमज्वर, सब प्रकारके ज्वर, खाँसी, श्वास, वमन, धातुस्थ ज्वर और दाह नष्ट होते हैं। इसको ज्वराशनि रस कहते हैं ॥ १६-१८ ॥ अर्द्धनारीश्वर रस । रसगन्धौ समौ शुद्धौ विषं ग्राह्यञ्च तत्समम् । जैपालं तत्समं ग्राह्यं मरिचञ्च चतुर्गुणम् ॥ १९ ॥ त्रिफलाया रसैर्मर्द्यं भावना पञ्चधा तथा । जम्बीराणां द्रवैर्नस्यमेकस्मिन्नासिकापुटे ॥ २२० ॥ शरीरार्द्धगतं घोरं ज्वरं हन्ति न संशयः । अर्द्धनारीश्वरो नाम रसः शम्भुप्रकीर्तितः ॥ २१ ॥ पारा और गंधक एक एक भाग, विष दो भाग, जमालगोटे दो भाग और कालीमिरच चार भाग इन सब औषधियोंको त्रिफलेके

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