रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १५७ ) बल्यं वृष्यं पुष्टिकरं सर्व्वरोगनिषूदनम् । सर्व्वज्वरहरं लौहं चन्द्रनाथेन भाषितम् ॥ ३९ ॥ इस औषधिके सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपा- तिक, द्वन्द्वज, विषम और धातुस्थज्वर तथा शीत, कम्प, तृषा, दाह, पसीना, वमन, भ्रम, रक्तपित्त, अतिसार, मन्दाग्नि, खाँसी, प्लीहा, यकृत्, गुल्म, दारुण आमवात, अर्श, घोरतर उदररोग, मूर्छा, पांडु, हलीमक, अजीर्ण, ग्रहणी, यक्ष्मा और शोथरोग ये नष्ट होते हैं। यह सर्व्वज्वरहर लोह अत्यंत बलकारक, शुक्रवर्द्धक, पुष्टिकारक और सर्व्वरोगनाशक है। यह चन्द्रनाथने कहा है ॥ ३६-३९ ॥ बृहत्सर्व्वज्वरहर लोह । पारदं गंधकञ्चैव ताम्रमभ्रञ्च माक्षिकम् । हिरण्यं तारतालञ्च कर्षमेकं पृथक् पृथक् ॥ ४० ॥ कान्तलोहं पलं देयं सर्वमेकीकृतं शुभम् । वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं दिनसप्तकम् ॥ ४१ ॥ कारवेल्लरसैर्वापि दशमूलरसेन च । पर्पट्याश्च कषायेण त्रिफलाक्वाथकेन वा ॥ ४२ ॥ गुडूच्याः स्वरसेनैव नागवल्लीरसेन च । काकमाचीरसेनैव निर्गुण्ड्याः स्वरसैस्तथा ॥ ४३ ॥ पुनर्नवार्द्रकाम्भोभिर्भावनाः परिकीर्त्तिताः । रक्तिकादिक्रमेणैव वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ४४ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म, सोनामाखीभस्म, सुवर्णभस्म, रूपाभस्म, शुद्ध हरितालभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला और कान्तलोहभस्म चार तोले लेवे. इन सबको एकत्र करके करेला, दशमूल, पित्तपापडा, त्रिफला, गिलोय, पान, मकोय, सम्हालू,