रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १४९ ) पारा १ भाग, गन्धक २ भाग इन दोनोंको एकत्र खरल कर ले, पश्चात् इसमें पारे और गन्धकसे चौथाई भाग तांबाभस्म, रूपाभस्म और सुवर्णकी भस्म मिलाकर तीन दिन तक चित्रकके रसमें धूपमें खरल करे, फिर इसमें आधा भाग विष मिलाकर फिर मछलीके पित्तकी भावना देवे; फिर इसको चित्रक क्वाथ और त्रिकुटेकी भावना देकर धूपमें सुखा लेवे। इस औषधिको छः ६ रत्ती परिमाण लेकर चित्रकके क्वाथ और त्रिकुटेके चूर्णके अनुपानके साथ सेवन करे। इस औषधिका सेवन कराकर रोगीके सम्पूर्ण शरीरमें तैल मर्दन करके शीतल जलसे स्नान करावे। जबतक रोगीको अत्यंत शीत नहीं लगे, मल मूत्रकी प्रवृत्ति नहीं होय और शरीर कांपने नहीं लगे तब- तक रोगीको शीतल जलमें रखना चाहिये। रोगीको क्षुधाके लगनेपर मरिच, शर्करा, दही, अन्न देवे । तथा बहुत थोड़ा अदरख, मछली और अन्य शाकके साथ भोजन करावे, दूसरे दिन फिर उसी प्रकार स्नान करावे। इसको सन्निपात सूर्य कहते हैं ॥ ९५-९८ ॥ स्वच्छन्दनायक रस । सूतगन्धकलोहानि रौप्यं संमर्दयेत् त्र्यहम् । सूर्यावर्त्तश्च निर्गुण्डी तुलसी गिरिकर्णिका ॥ ९९ ॥ अग्निवल्ल्यार्द्रकं वह्निर्विजयाथ जया सह । काकमाचीरसैरेषां पञ्चपित्तैश्च भावयेत् ॥ २०० ॥ अन्धमूषागतं पश्चाद्वालुकायन्त्रगं दिनम् । विपचेच्चूर्णितं खादेन्माषैकं चार्द्रकद्रवैः ॥ २०१ ॥ निर्गुण्डीदशमूलानां कषायं सोषणं पिबेत् । अभिन्यासं निहन्त्याशु रसः स्वच्छन्दनायकः ॥ छागीदुग्धेन मुद्रं वा पथ्यमत्र प्रयोजयेत् ॥२०२॥