भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( १५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मायूरमात्स्यवाराहच्छागमाहिषमेव च । पञ्चपित्तमिदं देयं भावनासु च सर्वदा ॥ २३० ॥ इसके उपरान्त अभिन्यास ज्वरकी चिकित्सा कहते हैं। पारा, गन्धक, लोहेकी भस्म, रूपाभस्म इन सबको एकत्र करके हुलहुल, सम्भालू, तुलसी, गिरिकर्णिका, कलिहारी, अदरख, चित्रक, जयन्ती, भांग और मकोय इन प्रत्येकके रसमें तीन दिन तक और पांच प्रकारके पित्तोंमें तीन दिन उत्तम विधिसे खरल करके भावना देवे । फिर अन्धमूषामें बन्द करके एक दिन वालुकायन्त्रमें पकाकर चूर्ण कर लेवे । यह १ मासे औषधि अदरखके रसके साथ सेवन करे और ऊपरसे सम्हालू और दशमूलके क्वाथमें काली मिरचोंका चूर्ण मिला- कर अनुपान करे । इसको स्वच्छन्दनायक रस कहते हैं। इस औषधिके सेवन करनेसे अभिन्यास ज्वर शीघ्र नष्ट होजाता है । इस औषधिके सेवन करनेके पश्चात् बकरीका दूध और मूंगका यूष पथ्य देवे । मोर, मछली, सुअर, बकरा और भैंस इन पांच जीवोंके पित्तको पञ्चपित्त कहते हैं । भावनाकार्यमें ये ही पांच पित्त लिये जाते हैं १९९-२०३॥ सन्निपातान्तक रस । शुद्धसूतः समो गन्धो दरदं शुद्धखर्परम् । रसस्य द्विगुणौ देयौ मृतताम्राम्लवेतसौ ॥ २०५ ॥ भृङ्गराजद्रवैर्भाव्यं प्रत्यहं भावना पृथक् । दातव्यं तच्चतुर्गुञ्जामार्द्रकस्य रसैः सह । सन्निपातं निहन्त्याशु सन्निपातान्तको रसः२०४ शुद्ध पारा, गन्धक, सिंग्रफ और खपरिया यह सब एक एक भाग तथा पारेसे दो गुनी तांबेकी भस्म और अमलवेत इन सबको भांगरेके रसमें सात भावना देवे । इसकी चार रत्तीकी मात्रा है । अदरखके रसके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे शीघ्र ही सन्निपात ज्वर नष्ट होजाता है । इसको सन्निपातान्तक रस कहते हैं ॥ २०४ ॥ २०५ ॥