भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १६३ ) भाग, सुवर्णभस्म पारदसे चतुर्थांश ( चौथाई भाग ), लोहाभस्म, तांबाभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक पारेसे दो दो भाग, वंगभस्म और प्रवाल ( मूंगा ) भस्म प्रत्येक पारेसे अर्द्ध भाग; मोती, शंख और सीपकी भस्म प्रत्येक पारेसे चौथाई भाग इन सबको एकत्र करके एक सीपमें भरकर पुटपाककी विधिसे पकावे । प्रातःकाल उठकर दो दो रत्तीप्रमाण इस औषधिका पीपलके चूर्ण, हींग और सेंधानमकके साथ सेवन करे ॥ ७१-७४ ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति वातपित्तकफोद्भवम् । प्लीहानं यकृतं गुल्मं साध्यासाध्यमथापिवा ॥ ७५ ॥ संततं सतताख्यञ्च त्र्याहिकं चातुराह्निकम् । कामलां पाण्डुरोगञ्च शोथं मेहमरोचकम् ॥ ७६ ॥ ग्रहणीमामदोषञ्च कासं श्वासञ्च दारुणम् । मूत्रकृच्छ्रातिसारञ्च नाशयेदविकल्पतः ॥ ७७ ॥ इस औषधिके सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक और श्लैष्मिकादि अष्टविध ज्वर, सन्तत, सतत, त्र्याहिक और चातुर्थिक ज्वर, प्लीहा, यकृत् रोग, साध्यासाध्य गुल्म, कामला, पाण्डु, सूजन, प्रमेह, अरुचि, संग्रहणी, आमाशयगत रोग, दारुण कास, श्वास, मूत्रकृच्छ्र और अतिसार शीघ्र ही नष्ट होजाते हैं । इसको विषमज्वरान्तक लोह कहते हैं ॥ ७५-७७ ॥ बृहद्विषमज्वरान्तक लोह । शुद्धसूतं तथा गन्धं कारयेत्कज्जलीं शुभाम् । मृतसूतं हेमतारं लौहमभ्रञ्च ताम्रकम् ॥ ७८ ॥ तालसत्त्वं वङ्गभस्म मौक्तिकं सप्रवालकम् । सुवर्णमाक्षिकञ्चापि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ ७९ ॥ निर्गुण्डी नागवल्ली च काकमाची सपर्पटी । त्रिफला कारवेल्लञ्च दशमूली पुनर्नवा ॥८०॥