रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । संनिपातज्वरहरः कफरोगं विनाशयेत् । एकजं द्वन्द्वजञ्चैव विविधं विषमज्वरम् ॥ ६९ ॥ अग्निमांद्यं शिरःशूलं विद्रधिं सभगन्दरम् । एतान्येव निहंत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥२७०॥ पारा, गन्धक, विष, त्रिकुटा, त्रिफला, मैनशिल, रूपाभस्म, सोना- भस्म, मोतीभस्म और हरितालभस्म यह सब प्रत्येक एक एक तोला, कस्तूरी छः मासे इन सबको एकत्र करके भांगरे, तुलसी और अदरखके रसमें अलग अलग भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । (कस्तूरी भावना देनेके बाद डालना चाहिये) इसको बृहच्चिन्तामणि रस कहते हैं । यह सब रोगोंको नष्ट करता है। जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्ध- कारका समूह नष्ट होजाता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे सन्निपात ज्वर, कफज रोग, एकदोषज और द्वन्द्वज ज्वर, विविध प्रकारके विषमज्वर, मंदाग्नि, शिरःशूल, विद्रधि और भगन्दररोग नष्ट होते हैं ॥ २६६-२७० ॥ विषमज्वरान्तक लोह । हिङ्गूलसम्भवं सूतं गन्धकेन सुकज्जलम् । रसपर्पटिवत्पाच्यं सूतांघ्रिहेमभस्मकम् ॥ ७१ ॥ लौहं ताम्रमभ्रकञ्च रसस्य द्विगुणं क्षिपेत् । वङ्गञ्चैव प्रवालञ्च रसार्द्धञ्च विनिःक्षिपेत् ॥ ७२ ॥ मुक्ता शङ्खं शुक्तिभस्म रसपादिकमेव च । मुक्तागृहे च संस्थाप्य पुटपाकेन साधयेत् ॥ ७३ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय द्विगुञ्जाफलमानतः । अनुपानं प्रयोक्तव्यं कणा हिङ्गु ससैन्धवम् ॥ ७४ ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा और गन्धक इन दोनोंकी एकत्र कजली बनाकर पर्पटीके समान पका लेवे। ऐसे उपरोक्त पर्पटी एक