भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( १६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गुडूची वृषकश्चापि सभृङ्गकेशराजकः । एतेषाञ्च रसेनैव भावयेत्त्रिदिनं पृथक् ॥ ८१ ॥ प्रथम शुद्ध पारे और गंधकको खरल करके कज्जली बना लेवे और फिर इस कज्जलीकी बराबर रससिन्दूर या पारद भस्म, सुवर्णभस्म, रूपाभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, तांबेकी भस्म, हारिताल भस्म, वंग- भस्म, मोती, मूंगा और सोनामाखीकी भस्म यह सब द्रव्य समान लेकर एकत्र चूर्ण करके सम्हालू, पान, मकोय, पित्तपापड़ा, त्रिफला, करेला, दशमूल, पुनर्नवा, गिलोय, अडूसा, भांगरा और कुकुरभांगरा इन प्रत्येकके रसमें तीन दिन तक अलग अलग भावना देवे॥२७८-२८१॥ गुञ्जामात्रां वटीं कुर्याच्छास्त्रवित्कुशलो भिषक् । पिप्पलीगुडकेनैव लिहेच्च वटिकां शुभाम् ॥८२॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति निरामं साममेव वा । सप्तधातुगतञ्चापि नानादोषोद्भवं तथा ॥ ८३ ॥ सततादिज्वरं हंति साध्यासाध्यमथापिवा । अभिघाताभिचारोत्थं जीर्णज्वरं विशेषतः ॥ ८४ ॥ पश्चात् कार्यमें दक्ष वैद्य इसकी एक एक रत्तीकी गोली बनालेवे । इन गोलियोंको पीपल और गुड़के साथ मिलाकर सेवन करे तो आम ( अपक्व ) और निराम ( पक्व ) अष्टविध ज्वर, सप्तधातुगत ज्वर, नानादोषोद्भव सततादि ज्वर, साध्यासाध्य अभिघात और अभिचार- जात ज्वर और विशेषकर जीर्ण ज्वर नष्ट होता है । इसको बृहद्विषम- ज्वरान्तक लोह कहते हैं ॥ ८२-८४ ॥ शीतभञ्जी रस । तालकं दरदोद्भूतपारदो गन्धकः शिला । क्रमवृद्ध्या ताम्रपात्रीं द्रवैरेतैर्विलेपयेत् ॥ ८५ ॥