रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मधुना भक्षयेत्प्रातर्विषमज्वरशांतये । धातुस्थांश्च ज्वरान्सर्वान्हन्यादेव न संशयः ॥५७॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । ज्वरं नानाविधं हंति कासं श्वासं क्षयन्तथा ॥५८॥ बलपुष्टिकरं नित्यं कामिनीं रमयेत्सदा । न च शुक्रक्षयं याति न बलं ह्रासतां व्रजेत् ॥५९॥ ऊर्ध्वंगं श्लेष्मजं हन्ति सन्निपातं सुदारुणम् । कामलां पांडुरोगञ्च प्रमेहं रक्तपित्तकम् ॥ महाराजवटी ख्याता राजयोग्या च सर्वदा ॥२६०॥ इस औषधिको शहदके साथ सेवन करनेसे विषमज्वर नष्ट होता है तथा सब प्रकारके ज्वर, धातुगतज्वर, वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक प्रभृति अनेक प्रकारके ज्वर खाँसी, श्वास और क्षय रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे बलकी वृद्धि होती है, शरीर पुष्ट होता है और सदैव स्त्रीके साथ प्रसंग करनेसे भी वीर्य क्षीण नहीं होता है, तथा दारुण कफोल्बण सन्निपात, कामला, पांडुरोग, प्रमेह और रक्तपित्त नष्ट होता है । इसको महाराजवटी कहते हैं । यह राजाओंको सेवन करनी उचित है ॥ २५७-२६० ॥ चिन्तामणि रस । हाटकं रजतं तालं मुक्ता गन्धकपारदौ । त्रिकटु कुनटी चैव कस्तूरी च पृथक् पृथक् ॥६१॥ जलेन वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । चिन्तामणिरसो ह्येष ज्वराष्टानां निकृन्तनः ॥६२॥ सुवर्णभस्म, रूपाभस्म, शुद्ध हरिताल भस्म, मोती भस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा, त्रिकुटा, मैनशिल और कस्तूरी यह सब औषधि समान भाग