भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १५९ ) ज्वर, सन्निपातज्वर, विषमज्वर, प्रलेपक ज्वर, घोरतर अर्द्धनारीश्वर- ज्वर, प्लीहज्वर, चातुर्थिक ज्वर, विपर्ययज्वर तथा ज्वर खाँसी, पाण्डु, कामला और मंदाग्नि प्रभृति समस्त उत्कट रोग केवल एक सप्ताहमें दूर होजाते हैं । इस औषधिका सेवन करके शालिचावलोंका भात, विडनमक और तक्रके साथ भोजन करे और ककोड़ा, करेला, कद्दू, ककड़ी आदि ककारादिगणकी सब वस्तु त्याग देवे और जबतक रोगी बलवान् न हो तबतक स्त्रीका संभोग त्याग देवे । इस दुर्लभ लोहको बृहत्सर्वज्वरहर लोह कहते हैं ॥ ४५-५२ ॥ महाराजवटी । रसगंधकमभ्रञ्च प्रत्येकं कर्षसम्मितम् । वृद्धदारकवङ्गञ्च लौहं कर्षार्द्धकं क्षिपेत् ॥ ५३ ॥ स्वर्णं ताम्रं च कर्पूरं प्रत्येकं कर्षपादिकम् । शक्राशनं वरी चैव श्वेतसर्जंलवंगकम् ॥ ५४ ॥ कोकिलाक्षं विदारी च मूसली शूकशिंबिकम् । जातीफलं तथा कोषं बला नागबला तथा ॥५५॥ माषद्वयमितं भागं तालमूल्या रसेन च । पिष्ट्वा च वटिका कार्या चतुर्गुञ्जाप्रमाणतः ॥५६॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला; विधारा, वंगभस्म और लोहभस्म यह प्रत्येक ६-६ मासे; सुवर्णभस्म, कपूर और तांबाभस्म यह प्रत्येक तीन तीन मासे; भांग, सतावर, सफेद राल, लौंग, तालमखाना, विदारीकन्द, मुसली, कौंचके बीज, जायफल, जावित्री, खिंरेंटी और गंगेरन यह प्रत्येक औषधि दो दो मासे लेवे, इन सबको एकत्र करके मुसलीके रसमें खरल करके चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे ॥ ५३-५६ ॥