भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १२३ ) रसो विश्वेश्वरो नाम प्रोक्तो नागार्जुनेन च । काकमाचीरसं चानु सैन्धवेन युतं पिबेत् ॥७३॥ पारेकी भस्म, तांबेकी भस्म, लोहेकी भस्म, शुद्ध हरितालभस्म, शुद्ध गंधक, कायफल, मेढाशिंगी, वच, सोंठ, भारंगी, हरड़, सुगंध- वाला और धनिया यह सब औषधि समान भाग लेकर पित्तपापड़ेके क्वाथमें अच्छे प्रकार खरल करके एक दिन भावना देवे । फिर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । नित्य प्रति एक गोली शहदके साथ सेवन करनेसे कफज्वर, पित्तज्वर और मदात्ययरोग नष्ट होता है । इस औषधिका सेवन करके मकोयके रसको सेंधानमकके साथ पान करे । इसको विश्वेश्वर रस कहते हैं । इसको स्वयं नागार्जुनसिद्धने कहा है ॥ ७१–७३ ॥ शीतारि रस । पारदं गन्धकं शुद्धं टंकणञ्च समं समम् । पारदाद् द्विगुणं देयं जैपालं तुषवर्जितम् ॥ ७४ ॥ सैन्धवं मरिचं चिञ्चात्वग्भस्मशर्करापि च । प्रत्येकं सूतकं तुल्यं जम्बीरैर्मर्दयेद्दिनम् ॥ ७५ ॥ द्विगुञ्जस्तप्ततोयेन वातश्लेष्मज्वरापहः । रसः शीतारिनामायं शीतज्वरहरः परः ॥ ७६ ॥ पारा, गंधक और सुहागा यह सब औषधि समान भाग लेवे; शुद्ध जमालगोटे दो भाग लेवे तथा सेंधानमक, कालीमिरच, इमलीकी छालकी भस्म और विष यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, इन सबको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिकी एक एक गोली गरम जलके साथ पान करनेसे वातश्लेष्मज्वर और शीतज्वर नष्ट होता है । इसका नाम शीतारि रस है ॥ ७४–७६ ॥