भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( १२४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । चिन्तामणि रस । रसविषगन्धकटंकणताम्रयवक्षारकव्योषम् । तालकफलत्रयञ्च क्षौद्रैः खलु शतं वारान् ॥ ७७ ॥ संमर्द्य रक्तिकामितवटिकाः कार्या भिषग्भिः प्राज्ञैः । शुण्ठीपिष्टेन सममेकां द्वे वाथवा तिस्रःसंप्राश्याः७८ पारा, विष, गन्धक, सुहागा, तांबेकी भस्म, जवारखार, त्रिकूटा, हरिताल और त्रिफला यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर शहदमें अच्छे प्रकारसे १०० सौ वार खरल करके विद्वान् वैद्य एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । रोगीके दोषोंके बलाबलको विचार कर एक अथवा दो या तीन गोली सोंठके समभाग चूर्णमें मिलाकर देवे ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ नारिकेलजलमनुपेयं सेव्येतसैन्धवं जीरं तक्रं पथ्यं प्रयोक्तव्यम् । प्रशमयति सन्निपातज्वरं तथा जीर्णज्वरं विविधञ्च ॥ ७९ ॥ प्लीहानं चाध्मानकं कासं श्वासं वह्निमान्द्यञ्च । चिन्तामणी रसोऽयं किल स्वयं भैरवेन निर्दिष्टः ॥ ८० ॥ और ऊपरसे नारियलका जल पान करे । इस पर सेंधानम और जीरेका चूर्ण मिलाकर तक्रका पथ्य करे । इन गोलियोंके सेवन कर- नेसे सन्निपातज्वर, अनेक प्रकारका जीर्णज्वर, प्लीहा, आध्मान, खाँसी, श्वास और मंदाग्नि आदि अनेक रोग नष्ट होते हैं । यह चिन्तामणि रस स्वयं भैरवने निर्माण किया है ॥ ७९ ॥ ८० ॥ रसं गन्धं विषं लोहं धूर्त्तबीजन्तु तत्समम् । द्वौ भागौ ताम्रवह्निं च व्योषचूर्णञ्च तत्समम् ॥८१॥ जम्बीरस्य च मज्जाभिरार्द्रकस्य रसैर्युतम् । अस्यानुपानेन वटी ज्वरे देया प्रयत्नतः ॥ ८२ ॥