रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १२५ ) गुञ्जाद्वयं वटीं खादेत्सद्योज्वरं व्यपोहति । वातिकं पैत्तिकञ्चापि श्लैष्मिकं सान्निपातिकम्॥८३॥ ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च चातुर्थिकविपर्ययम् । असाध्यञ्चापि साध्यञ्च ज्वरञ्चैवातिदुस्तरम् ॥ ८४॥ अग्निमान्द्येऽप्यजीर्णे च आध्मानेऽनिलसम्भवे । अतिसारे छर्दिते च अरोचकनिपीडिते ॥ ८५ ॥ ज्वरान्सर्व्वान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा । चिन्तामणिरसो नाम सर्व्वज्वरं व्यपोहति ॥ ८६ ॥ अन्यमत–पारा १ भाग, गंधक १ भाग, विष १ भाग, लोहभस्म १ भाग, धतूरेके बीज ४ भाग, तांबेकी भस्म २ भाग, चीतेकी जड़ २ भाग और त्रिकुटेका चूर्ण २ भाग लेवे, इन सबको एकत्र करके जम्भीरीनींबूकी मज्जा (गुद्दा) और अदरखके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोली उचित अनुपानके साथ सेवन करनेसे शीघ्र ही ज्वर नष्ट हो जाता है। इस औषधिके सेवनसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक, ऐकाहिक, द्व्याहिक, त्र्याहिक, चातुर्थिक और इनके विपर्यय ज्वर एवं साध्य और असाध्य, अत्यंत दुस्तरज्वर, मंदाग्नि, अजीर्ण, आध्मान, अतीसार, वमन और अरुचि विनष्ट होती हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे सूर्योदयसे अंधकार नाश होनेके समान सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं। इसको चिंतामणि रस कहते हैं ॥ ८१–८६ ॥ अथ सन्निपातज्वर पर । कुलवधू । शुद्धसूतं मृतं ताम्रं मृतं नागं मनःशिला । तुत्थकं तस्य तुल्यांशं दिनमेकं विमर्दयेत् ॥ ८७ ॥