रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १६७ ) करके पुटपाक करे । फिर इसका चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण पानके रसके साथ सेवन करनेसे विषमज्वर नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेपर दूधके साथ भात खाय । इसको मेघनाद रस कहते हैं॥ ९३॥९४॥ शीतज्वरहर रस । सूतमाक्षिकगन्धानां भागश्चारुष्करस्य च । तथाष्टौ तालकाच्चूर्णाद्रविदुग्धस्य षोडश ॥९५॥ स्नुहीक्षीरस्य चैवाष्टौ सर्वं मृद्वग्निना पचेत् ॥ स्वांगशीतं समुद्धृत्य ततः खल्ले विमर्दयेत् । शीतज्वरहरो नाम्ना रसोऽयं परिकीर्तितः ॥ ९६ ॥ पारा, सोनामाखी भस्म, गंधक और भिलावे यह सब औषधि एक एक भाग, हरिताल आठ भाग, आकका दूध १६ भाग, थूहरका दूध आठ भाग इन सब द्रव्योंको एकत्र करके अग्निमें मृदुपाक करे शीतल होनेपर खरलमें पीस लेवे । इसको शीतज्वरहर रस कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे शीतज्वर नष्ट होजाता है ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ शीतभञ्जी रस । पारदं रसकं तालं तुत्थं टंकणगन्धकम् । सर्वमेतत्समं शुद्धं कारवेल्लरसैर्दिनम् ॥९७॥ मर्दयेत्तेन कल्केन ताम्रपात्रोदरं लिपेत् । अंगुलार्द्धार्द्धमानेन तं पचेत्सिकताह्वये ॥ ९८ ॥ यन्त्रे यावत्स्फुटन्त्येव व्रीहयस्तस्य पृष्ठतः । ततस्तच्छीतलं ग्राह्यं ताम्रपात्रोदराद्भिषक् ॥ ९९ ॥ माषैकं पर्णखण्डेन भक्षयेन्मरिचैः समम् । शीतभञ्जीरसो नाम त्रिदिनान्नाशयेज्ज्वरम् ॥३००॥