भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( १६८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पारा, खपरिया, हरिताल, तूतिया, सुहागा और गंधक इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर करेंलेके रसमें एकत्र खरल करके एक तांबेके पात्रमें चौथाई अंगुल परिमाण ऊंचा लेप करदेवे और फिर उसको हांडीके मध्यमें औंधाकर वालुकायन्त्रमें पकावे । वालूके ऊपर धान आदि अन्न बिछा देवे । जब देखे कि धान फटने लगे अर्थात् उनकी खीले होने लगें तब इसको शीतल होनेपर उतार कर तांबेके पात्रमें स्थित औषधिको ग्रहण कर लेवे । इस औषधिको एक मासे परिमाण पान और मरिचोंके साथ भक्षण करे । इसको शीतभञ्जी रस कहते हैं । इस औषधिके भक्षण करनेसे तीन दिनमें सब प्रकारका ज्वर नष्ट होजाता है ॥ २९७-३०० ॥ पञ्चानन रस । रसकं तालकं तुत्थं टंकणं रसगन्धकम् । तुल्यांशं सुषरीतोयैर्मर्दयेद्यामयुग्मकम् ॥ ३०१ ॥ कृत्वा गोलं ताम्रपात्रेणाधोवक्रेण रोधयेत् । स्थालीं मृत्कर्पटैर्लिप्त्वा पचेच्चुल्यां दिनं ततः३०२. तच्छीतं ताम्रभस्मापि गृह्णीयात्सुरसाजलैः । यामं मर्द्यं ततो वल्लं तुलसीमरिचैर्युतम् ॥३०३॥ हन्ति सर्वज्वरं घोरं विषमञ्च त्रिदोषजम् । धात्रीकल्केन वा युक्तं दाहाख्यं विषमं जयेत् ३०४॥ पथ्यं दुग्धौदनं दद्यान्मुद्गयूषं सशर्करम् । ज्वरे धातुगते दद्यात्पिप्पलीक्षौद्रसंयुतम् । अयं पञ्चाननो नाम विषमज्वरनाशनः ॥३०५॥ खपरिया, हरिताल, तूतिया, सुहागा, पारा और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर करेलेके रसमें दो प्रहर तक खरल करके एक हांडीमें रखकर ऊपरसे एक तांबेके पात्रसे ढककर सन्धि लेप