भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १६९ ) कर उस हांडीको वालूसे परिपूर्ण कर देवे । फिर उस हांडीको चूल्हे- पर चढा देवे और एक दिन तक यथाविधिसे पकावे । फिर इसके शीतल होनेपर ताम्रभस्म और वह औषध एक पहर तुलसीके रसमें खरल करे । फिर यह औषधि तीन रत्ती तुलसीके रस और काली- मिरचोंके चूर्णके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विषमज्वर और घोरतर त्रिदोषज्वर नष्ट होता है । आमलोंके कल्कके साथ सेवन करनेसे विषमज्वर, दाहज्वर नष्ट होजाते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे दूधके साथ भात अथवा मिश्रीके साथ मूंगका यूष पथ्य देवे । धातुगतज्वरमें पीपलके चूर्ण और शहदके साथ यह औषधि सेवन करे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं । यह औषधि सब प्रकारके विषमज्वरोंको दूर करती है ॥ ३०१-३०५ ॥ वमनयोग । कुमारीमूलकर्षैकं पिबेत्कोष्णजलेन तु । विषमन्तु ज्वरं हन्ति वमनेन चिरन्तनम् ॥ ३०६ ॥ घीक्वारकी जड़ एक तोला परिमाण लेकर गरम जलके साथ पीस- कर पान करनेसे वमन होकर पुराना विषमज्वर नष्ट होता है ॥३०६॥ विश्वेश्वर रस । दरदं गन्धकं सूतं तुल्यांशं मर्दयेद्द्रवैः । अश्वत्थजैरूयहं पश्चाद्रसैः कानकमूलजैः ॥ ३०७ ॥ निदिग्धिकारसैः काकमाचिकाया रसैः पुनः । द्विगुञ्जां वा त्रिगुञ्जां वा गोक्षीरेण प्रदापयेत् ॥ रात्रिज्वरं निहन्त्याशु नाम्ना विश्वेश्वरो रसः॥३०८॥ सिंग्रफ, गंधक और पारा यह तीनों औषधि समान भाग लेकर पीपलकी छाल, धतूरेकी जड़, कटेरी और मकोय इन प्रत्येकके रसमें तीन दिन तक खरल करके पश्चात् रोगीकी अवस्थाको विचार कर