रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दो अथवा तीन रत्ती परिमाण गायके दूधके साथ इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे रात्रिज्वर नष्ट होता है । इसको विश्वेश्वर रस कहते हैं ॥ ३०७ ॥ ३०८ ॥ त्र्याहिकारि रस । रसेन गन्धं शंखञ्च शिखिग्रीवञ्च पादिकम् । गोजिह्वया जयन्त्या च तण्डुलीयैश्च भावयेत्॥३०९॥ प्रत्येकं सप्त सप्ताथ शुष्कं गुञ्जाचतुष्टयम् । जरणेन घृतेनाद्यात् त्र्याहिकज्वरशान्तये ॥३१० ॥ पारा ४ भाग, गन्धक, शंखभस्म और तूतिया एक एक भाग लेवे । इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग सात वार भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको जीरेके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करनेसे त्र्याहिक ज्वर नष्ट होता है ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥ चातुर्थिकारि रस । हरितालं शिलां तुत्थं शंखचूर्णञ्च गन्धकम् । समांशं मर्दयेत्प्राज्ञः कुमारीरसभावितम् ॥ ११ ॥ शरावसंपुटे कृत्वा पश्चाद्गजपुटे पचेत् । कुमारिकारसेनैव वल्लमात्रा वटी कृता ॥ १२ ॥ दत्ता शीतज्वरं हन्ति चातुर्थिकं विशेषतः । मरीचघृतयोगेन तक्रं पीत्वा चरेद्वटीम् ॥ एतया वमनं भूत्वा ज्वरश्शीघ्रं विनश्यति ॥ १३ ॥ हरिताल, मैनशिल, तूतिया, शंख और गन्धक यह सब द्रव्य समान भाग लेकर घीक्वारके रसमें एकत्र खरल करे । फिर इसको शरावसम्पुटमें रखकर गजपुटमें पकावे । फिर घीक्वारके रसमें खरल