रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १७१ ) करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे शीतज्वर और चातुर्थिकज्वर नष्ट होता है। यह वटिका खानेके पहले तक्र पीकर ऊपरसे कालीमिरचोंका चूर्ण घीके साथ सेवन करे तो वमन होकर शीघ्र ही ज्वर नष्ट होजाता है। इसको चातुर्थिकारि रस कहते हैं ॥ ११-१३ ॥ चिन्तामणि रस । रसं गन्धं विषं शुल्वं मृतमभ्रं फलत्रिकम् । त्र्यूषणं दन्तिबीजञ्च समं खल्ले विमर्दयेत् ॥ १४ ॥ द्रोणपुष्पीरसैर्भाव्यं शुष्कं तद्वस्त्रगालितम् । चिन्तामणिरसो ह्येष अजीर्णे शस्यते सदा ॥१५॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति सर्वशूलहरः परः । गुञ्जैकं वा त्रिगुञ्जं वा देयमार्द्रकवारिणा ॥ १६ ॥ पारा, गन्धक, विष, तांबेकी भस्म, अभ्रकभस्म, त्रिफला, त्रिकुटा और जमालमोटा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर द्रोणपुष्पी ( गूमा ) के रसमें भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसको बारीक वस्त्रमें छान लेवे । इसको चिन्तामणि रस कहते हैं । अजीर्णरोगमें यह औषधि अतीव हितकारी है, रोगीकी अवस्थाको विचार कर यह औषधि एक रत्तीसे तीन रत्ती परिमाण तक अदरखके रसके साथ सेवन करे । इससे अष्टविध ज्वर और सब प्रकारकी शूल रोग नष्ट होजाता है ॥ १४-१६ ॥ बृहच्चिन्तामणि रस । रसगन्धकलौहानि ताम्रं तारं हिरण्यकम् । हरितालं खर्परञ्च कांस्यं वङ्गञ्च विद्रुमम् ॥ १७ ॥ मुक्तामाक्षिककाशीशं शिलाटङ्कणकं समम् । कर्पूरञ्च समं दत्त्वा भावना सप्तसप्तकम् ॥ १८ ॥