रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भार्ङ्गी वासा च निर्गुण्डी नागवल्ली जयन्तिका । कारवेल्लं पटोलञ्च शक्राशनं पुनर्नवा ॥ १९ ॥ आर्द्रकञ्च ततो दद्यात्प्रत्येकं वारसप्तकम् । चिन्तामणिरसो नाम्ना सर्वज्वरविनाशनः ॥३२०॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, तांबेकी भस्म, चांदीकी भस्म, सोनेकी भस्म, हरितालभस्म, खपरिया, काँसेकी भस्म, वंगभस्म, मोती, मूंगा, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध हीराकसीस, मैनशिल, सुहागा और कपूर यह सब औषधि समान भाग लेकर, भारंगी, अडूसा, सम्हालू, पान, जयन्ती, करेला, परवल, भांग, पुनर्नवा और अदरख इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इसको बृहच्चिन्तामणि रस कहते हैं । - यह सब प्रकारके ज्वरोंको हरनेवाला है ॥ ३१७-३२० ॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । द्वन्द्वजं विषमाख्यञ्च धातुस्थञ्च ज्वरं जयेत् ॥२१॥ कासं श्वासं तथा शोथं पाण्डुरोगं हलीमकम् । प्लीहानमग्रमांसञ्च यकृतञ्च विनाशयेत् ॥ २२ ॥ रोगीकी अवस्थाको विचार कर यह औषधि एक अथवा दो रत्ती परिमाण यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक, द्वन्द्वज, विषम, सर्व- धातुगत ज्वर तथा खाँसी, श्वास, शोथ, पांडु, हलीमक, प्लीहा, अग्र- मांस और यकृतरोग दूर होते हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥ महाज्वरांकुश रस । पारदं गन्धकं ताम्रं हिंगुलं तालमेव च । वङ्गं लौहं माक्षिकञ्च खर्परञ्च मनःशिला ॥ २३॥ मृताभ्रकं गैरिकं च टङ्कणं दन्तिबीजकम् । सर्वाण्येतानि द्रव्याणि चूर्णयित्वा विभावयेत्॥२४॥