भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १७३ ) जम्बीरविजयाचित्रतुलसीतिन्तिडीरसैः । एभिर्दिनत्रयं भाव्यं निर्जने रौद्रसंकुले ॥ २५ ॥ पारा, गंधक, तांबेकी भस्म, सिंग्रफ, हरितालभस्म, वंगभस्म, लोह- भस्म, सोनामाखीभस्म, खपरिया, मैनशिल, अभ्रकभस्म, गेरू, सुहागा और दन्तीके बीज यह सब औषधि समान भाग लेकर चूर्ण कर ले, फिर इस चूर्णको जम्भीरी, भांग, चित्रक, तुलसी और इमली इन सबके रसमें तीन दिन तक प्रचण्ड धूपमें भावना देवे ॥ २३-२५ ॥ चणमात्रां वटीं कृत्वा छायाशुष्काञ्च कारयेत् । मन्दाग्निदीपनी चैव सर्वज्वरविनाशिनी ॥ २६ ॥ द्वन्द्वजं सर्वजञ्चैव चिरकालसमुद्भवम् । ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च ज्वरन्तु सान्निपातिकम्॥२७॥ चातुर्थिकं तथाऽत्युग्रं जलदोषसमुद्भवम् । सर्वाञ्ज्वरान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ महाज्वराङ्कुशो नाम रसोऽयं मुनिभाषितः ॥ २८ ॥ फिर चनेकी बराबर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे। यह औषधि मंदाग्निको प्रज्वलित करती है और सब प्रकारके ज्वरको दूर करती है, जिस प्रकार सूर्योदयसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका ज्वर सर्वज, द्वन्द्वज, ऐका- हिक, द्वयाहिक, सान्निपातिक,चातुर्थिक और जलदोषज प्रभृति अत्यंत उग्र सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं। इसको महाज्वरांकुश रस कहते हैं ॥ २६-२८ ॥ तन्त्रान्तरोक्त महाज्वरांकुश । पारदं हिंगुलं ताम्रं माक्षिकं तुत्थमेव च । वङ्गं मृतञ्च गन्धञ्च खर्परञ्च मनःशिला ॥ २९ ॥ तालकं घनपाषाणं गैरिकं टंकणन्तथा । ७