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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( १६९ ) कर उस हांडीको वालूसे परिपूर्ण कर देवे । फिर उस हांडीको चूल्हे- पर चढा देवे और एक दिन तक यथाविधिसे पकावे । फिर इसके शीतल होनेपर ताम्रभस्म और वह औषध एक पहर तुलसीके रसमें खरल करे । फिर यह औषधि तीन रत्ती तुलसीके रस और काली- मिरचोंके चूर्णके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे विषमज्वर और घोरतर त्रिदोषज्वर नष्ट होता है । आमलोंके कल्कके साथ सेवन करनेसे विषमज्वर, दाहज्वर नष्ट होजाते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे दूधके साथ भात अथवा मिश्रीके साथ मूंगका यूष पथ्य देवे । धातुगतज्वरमें पीपलके चूर्ण और शहदके साथ यह औषधि सेवन करे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं । यह औषधि सब प्रकारके विषमज्वरोंको दूर करती है ॥ ३०१-३०५ ॥ वमनयोग । कुमारीमूलकर्षैकं पिबेत्कोष्णजलेन तु । विषमन्तु ज्वरं हन्ति वमनेन चिरन्तनम् ॥ ३०६ ॥ घीक्वारकी जड़ एक तोला परिमाण लेकर गरम जलके साथ पीस- कर पान करनेसे वमन होकर पुराना विषमज्वर नष्ट होता है ॥३०६॥ विश्वेश्वर रस । दरदं गन्धकं सूतं तुल्यांशं मर्दयेद्द्रवैः । अश्वत्थजैरूयहं पश्चाद्रसैः कानकमूलजैः ॥ ३०७ ॥ निदिग्धिकारसैः काकमाचिकाया रसैः पुनः । द्विगुञ्जां वा त्रिगुञ्जां वा गोक्षीरेण प्रदापयेत् ॥ रात्रिज्वरं निहन्त्याशु नाम्ना विश्वेश्वरो रसः॥३०८॥ सिंग्रफ, गंधक और पारा यह तीनों औषधि समान भाग लेकर पीपलकी छाल, धतूरेकी जड़, कटेरी और मकोय इन प्रत्येकके रसमें तीन दिन तक खरल करके पश्चात् रोगीकी अवस्थाको विचार कर

( १७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दो अथवा तीन रत्ती परिमाण गायके दूधके साथ इस औषधिका सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे रात्रिज्वर नष्ट होता है । इसको विश्वेश्वर रस कहते हैं ॥ ३०७ ॥ ३०८ ॥ त्र्याहिकारि रस । रसेन गन्धं शंखञ्च शिखिग्रीवञ्च पादिकम् । गोजिह्वया जयन्त्या च तण्डुलीयैश्च भावयेत्॥३०९॥ प्रत्येकं सप्त सप्ताथ शुष्कं गुञ्जाचतुष्टयम् । जरणेन घृतेनाद्यात् त्र्याहिकज्वरशान्तये ॥३१० ॥ पारा ४ भाग, गन्धक, शंखभस्म और तूतिया एक एक भाग लेवे । इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग सात वार भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको जीरेके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करनेसे त्र्याहिक ज्वर नष्ट होता है ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥ चातुर्थिकारि रस । हरितालं शिलां तुत्थं शंखचूर्णञ्च गन्धकम् । समांशं मर्दयेत्प्राज्ञः कुमारीरसभावितम् ॥ ११ ॥ शरावसंपुटे कृत्वा पश्चाद्गजपुटे पचेत् । कुमारिकारसेनैव वल्लमात्रा वटी कृता ॥ १२ ॥ दत्ता शीतज्वरं हन्ति चातुर्थिकं विशेषतः । मरीचघृतयोगेन तक्रं पीत्वा चरेद्वटीम् ॥ एतया वमनं भूत्वा ज्वरश्शीघ्रं विनश्यति ॥ १३ ॥ हरिताल, मैनशिल, तूतिया, शंख और गन्धक यह सब द्रव्य समान भाग लेकर घीक्वारके रसमें एकत्र खरल करे । फिर इसको शरावसम्पुटमें रखकर गजपुटमें पकावे । फिर घीक्वारके रसमें खरल

भाषाटीकासहित । ( १७१ ) करके तीन तीन रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे शीतज्वर और चातुर्थिकज्वर नष्ट होता है। यह वटिका खानेके पहले तक्र पीकर ऊपरसे कालीमिरचोंका चूर्ण घीके साथ सेवन करे तो वमन होकर शीघ्र ही ज्वर नष्ट होजाता है। इसको चातुर्थिकारि रस कहते हैं ॥ ११-१३ ॥ चिन्तामणि रस । रसं गन्धं विषं शुल्वं मृतमभ्रं फलत्रिकम् । त्र्यूषणं दन्तिबीजञ्च समं खल्ले विमर्दयेत् ॥ १४ ॥ द्रोणपुष्पीरसैर्भाव्यं शुष्कं तद्वस्त्रगालितम् । चिन्तामणिरसो ह्येष अजीर्णे शस्यते सदा ॥१५॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति सर्वशूलहरः परः । गुञ्जैकं वा त्रिगुञ्जं वा देयमार्द्रकवारिणा ॥ १६ ॥ पारा, गन्धक, विष, तांबेकी भस्म, अभ्रकभस्म, त्रिफला, त्रिकुटा और जमालमोटा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर द्रोणपुष्पी ( गूमा ) के रसमें भावना देकर सुखा लेवे । फिर इसको बारीक वस्त्रमें छान लेवे । इसको चिन्तामणि रस कहते हैं । अजीर्णरोगमें यह औषधि अतीव हितकारी है, रोगीकी अवस्थाको विचार कर यह औषधि एक रत्तीसे तीन रत्ती परिमाण तक अदरखके रसके साथ सेवन करे । इससे अष्टविध ज्वर और सब प्रकारकी शूल रोग नष्ट होजाता है ॥ १४-१६ ॥ बृहच्चिन्तामणि रस । रसगन्धकलौहानि ताम्रं तारं हिरण्यकम् । हरितालं खर्परञ्च कांस्यं वङ्गञ्च विद्रुमम् ॥ १७ ॥ मुक्तामाक्षिककाशीशं शिलाटङ्कणकं समम् । कर्पूरञ्च समं दत्त्वा भावना सप्तसप्तकम् ॥ १८ ॥

( १७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भार्ङ्गी वासा च निर्गुण्डी नागवल्ली जयन्तिका । कारवेल्लं पटोलञ्च शक्राशनं पुनर्नवा ॥ १९ ॥ आर्द्रकञ्च ततो दद्यात्प्रत्येकं वारसप्तकम् । चिन्तामणिरसो नाम्ना सर्वज्वरविनाशनः ॥३२०॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, तांबेकी भस्म, चांदीकी भस्म, सोनेकी भस्म, हरितालभस्म, खपरिया, काँसेकी भस्म, वंगभस्म, मोती, मूंगा, सोनामाखीकी भस्म, शुद्ध हीराकसीस, मैनशिल, सुहागा और कपूर यह सब औषधि समान भाग लेकर, भारंगी, अडूसा, सम्हालू, पान, जयन्ती, करेला, परवल, भांग, पुनर्नवा और अदरख इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इसको बृहच्चिन्तामणि रस कहते हैं । - यह सब प्रकारके ज्वरोंको हरनेवाला है ॥ ३१७-३२० ॥ वातिकं पैत्तिकञ्चैव श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । द्वन्द्वजं विषमाख्यञ्च धातुस्थञ्च ज्वरं जयेत् ॥२१॥ कासं श्वासं तथा शोथं पाण्डुरोगं हलीमकम् । प्लीहानमग्रमांसञ्च यकृतञ्च विनाशयेत् ॥ २२ ॥ रोगीकी अवस्थाको विचार कर यह औषधि एक अथवा दो रत्ती परिमाण यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक, द्वन्द्वज, विषम, सर्व- धातुगत ज्वर तथा खाँसी, श्वास, शोथ, पांडु, हलीमक, प्लीहा, अग्र- मांस और यकृतरोग दूर होते हैं ॥ २१ ॥ २२ ॥ महाज्वरांकुश रस । पारदं गन्धकं ताम्रं हिंगुलं तालमेव च । वङ्गं लौहं माक्षिकञ्च खर्परञ्च मनःशिला ॥ २३॥ मृताभ्रकं गैरिकं च टङ्कणं दन्तिबीजकम् । सर्वाण्येतानि द्रव्याणि चूर्णयित्वा विभावयेत्॥२४॥

भाषाटीकासहित । ( १७३ ) जम्बीरविजयाचित्रतुलसीतिन्तिडीरसैः । एभिर्दिनत्रयं भाव्यं निर्जने रौद्रसंकुले ॥ २५ ॥ पारा, गंधक, तांबेकी भस्म, सिंग्रफ, हरितालभस्म, वंगभस्म, लोह- भस्म, सोनामाखीभस्म, खपरिया, मैनशिल, अभ्रकभस्म, गेरू, सुहागा और दन्तीके बीज यह सब औषधि समान भाग लेकर चूर्ण कर ले, फिर इस चूर्णको जम्भीरी, भांग, चित्रक, तुलसी और इमली इन सबके रसमें तीन दिन तक प्रचण्ड धूपमें भावना देवे ॥ २३-२५ ॥ चणमात्रां वटीं कृत्वा छायाशुष्काञ्च कारयेत् । मन्दाग्निदीपनी चैव सर्वज्वरविनाशिनी ॥ २६ ॥ द्वन्द्वजं सर्वजञ्चैव चिरकालसमुद्भवम् । ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च ज्वरन्तु सान्निपातिकम्॥२७॥ चातुर्थिकं तथाऽत्युग्रं जलदोषसमुद्भवम् । सर्वाञ्ज्वरान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ महाज्वराङ्कुशो नाम रसोऽयं मुनिभाषितः ॥ २८ ॥ फिर चनेकी बराबर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे। यह औषधि मंदाग्निको प्रज्वलित करती है और सब प्रकारके ज्वरको दूर करती है, जिस प्रकार सूर्योदयसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका ज्वर सर्वज, द्वन्द्वज, ऐका- हिक, द्वयाहिक, सान्निपातिक,चातुर्थिक और जलदोषज प्रभृति अत्यंत उग्र सब प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं। इसको महाज्वरांकुश रस कहते हैं ॥ २६-२८ ॥ तन्त्रान्तरोक्त महाज्वरांकुश । पारदं हिंगुलं ताम्रं माक्षिकं तुत्थमेव च । वङ्गं मृतञ्च गन्धञ्च खर्परञ्च मनःशिला ॥ २९ ॥ तालकं घनपाषाणं गैरिकं टंकणन्तथा । ७

( १७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दन्तिबीजानि सर्वाणि चूर्णयित्वा विभावयेत् ॥ भावना पूर्ववद्देया वटीं कुर्याच्च पूर्ववत् ॥ ३३० ॥ पारा, सिंग्रफ, तांबेकी भस्म, सोनामाखीभस्म, शुद्ध तूतिया, वंगभस्म, गंधक, खपरिया, मैनशिल, हरितालभस्म, घनपाषाण ( कांतपाषाण ), गेरू, सुहागा और जमालगोटे इन सब औषधियोंका चूर्ण करके पूर्वोक्त भावनाके द्रव्यों द्वारा पूर्ववत् भावना देकर चनेकी बराबर गोली बना लें । इसको महाज्वरांकुश रस कहते हैं ॥३२९॥३३०॥ सर्वतोभद्र रस । विशुद्धं गगनं ग्राह्यं द्विकर्षं शुद्धगन्धकम् । तोलकं तोलकार्द्धञ्च हिंगुलोत्थरसन्तथा ॥ ३१ ॥ कर्पूरं केशरं मांसी तेजपत्रं लवङ्गकम् । जातीकोषफलञ्चैव सूक्ष्मैला करिपिप्पली ॥ ३२ ॥ कुष्ठं तालीशपत्रञ्च धातकी चोचमुस्तकम् । हरीतकी मरीचं च शृङ्गवेरं विभीतकम् ॥ ३३ ॥ पिप्पल्यामलकञ्चैव शाणभागं विचूर्णितम् । सर्वमेकीकृतं पिष्ट्वा वटीं कुर्याद्द्विगुञ्जिकाम् ॥ ३४॥ अभ्रकभस्म २ कर्ष, शुद्ध गंधक १ तोला, सिंग्रफमेंसे निकाला हुआ पारा ६ मासे, कपूर, नागकेशर, वालछड़, तेजपात, लौंग, जावित्री, जायफल, छोटी इलायची, गजपीपल, कूठ, तालीशपत्र, धायके फूल, दारचीनी, नागरमोथा, हरड़, काली मिरच, सोंठ, बहेड़ा, पीपल और आमला यह प्रत्येक चार चार मासे सबको एकत्र उत्तम रीतिसे पीसकर दो दो रत्तीकी गोलियां बना लेवे ॥३१-३४ ॥ भक्षयेत्पर्णखण्डेन मधुना सितयापि वा । रोगं ज्ञात्वाऽनुपानं च प्रातः कुर्याद्विचक्षणः ॥३५॥

भाषाटीकासहित । ( १७५ ) हन्ति मन्दानलान्सर्वानामंदोषं विषूचिकाम् । पित्तश्लेष्मभवं रोगं वातश्लेष्मभवं तथा ॥ ३६ ॥ आनाहं मूत्रकृच्छ्रं च संग्रहग्रहणीं वमिम् । अम्लपित्तं शीतपित्तं रक्तपित्तं विशेषतः ॥ ३७ ॥ चिरज्वरं पित्तभवं धातुस्थं विषमज्वरम् । कासं पञ्चविधं हन्ति कामलां पाण्डुमेव च ॥३८॥ सर्वलोकहितार्थाय शिवेन भाषितः पुरा । सर्वतोभद्रनामायं रसः साक्षान्महेश्वरः ॥ ३९ ॥ इस औषधिका पान, शहद और मिश्रीके साथ सेवन करे। विच- क्षण वैद्य रोगको विचार कर अनुपानकी कल्पना करे। यह औषधि प्रातःकाल सेवन करनी चाहिये । इस औषधिके सेवन करनेसे मदाग्नि, आमदोष, विषूचिका, पित्तकफोत्पन्न रोग, वातश्लेष्मोत्पन्न रोग, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, संग्रहणी, वमन, अम्लपित्त, शीतपित्त, रक्तपित्त, बहुत दिनोंका पित्तज्वर, धातुस्थ विषम ज्वर, पांच प्रकारकी खाँसी, कामला और पांडु आदि समस्त रोग नष्ट होजाते हैं। पूर्वकालमें इस औषधिको लोकहितके लिये महादेवजीने कथन किया था । इसको सर्वतोभद्र रस कहते हैं। यह रस साक्षात् महेश्वरके समान गुणकारी है॥३५-३९॥ बृहज्ज्वरान्तक । रसं गन्धं तोलकं च जातीकोषफलं तथा । हेमभस्म तु पादैकं तोलार्द्धं रूप्यलौहकम् ॥३४०॥ अभ्रं शिलाजतु चैव भृङ्गराजं च मुस्तकम् । केशराजमपामार्गं लवङ्गं च फलत्रिकम् ॥ ४१ ॥ वरांगवल्कलश्चैव पिप्पलीमूलमेव च । सैन्धवञ्च विडञ्चैव गुडूचीचूर्णमेव च ॥ ४२ ॥

( १७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कण्टकारी रसोनञ्च धान्यकं जीरकद्वयम् । चन्दनं देवकाष्ठञ्च दार्बीन्द्रयवमेव च ॥ ४३ ॥ किराततिक्तकं वालं तोलकञ्च समाहरेत् । द्वितोलं मरिचं देयं भावयेदार्द्रजै रसैः ॥ ४४ ॥ माषार्द्धं भक्षयेत्प्रातर्मधुना मधुरीकृतम् । ज्वरं नानाविधं हन्ति शुक्रस्थं चिरकालजम् ॥ साध्यासाध्यविचारोऽत्र नैव कार्यो भिषग्वरैः॥४५॥ पारा, गन्धक, जावित्री और जायफल यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, सुवर्णकी भस्म ३ मासे, चांदीकी भस्म ६ मासे, लोहेकी भस्म ६ मासे, अभ्रकभस्म, शिलाजीत, भांगरा, नागरमोथा, कुकुर- भांगरा, चिरचिटा, लौंग, त्रिफला, दालचीनी, पीपलामूल, सेंधानमक, विडनमक, गिलोय, कटेरी, लहसुन, धनिया, जीरा, कालाजीरा, चंदन, देवदारु, दारुहलदी, इन्द्रजौ, चिरायता और सुगन्धवाला यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, काली मिरचोंका चूर्ण दो तोले इन सबको एकत्र करके अंदरखके रसमें भावना देकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रातःकाल इस औषधिका शहदके साथ सेवन करे । इस औषधिके प्रयोग करते समय वैद्य रोगके साध्यासाध्यका विचार नहीं करे । यह औषध अनेक प्रकारके ज्वर,शुक्रगत ज्वर और पुराने ज्वरको दूर करती है ॥ ३४०-३४५ ॥ अन्तर्धातुगतञ्चैव नाशयेन्नात्र संशयः । भूतोत्थं श्रमजञ्चापि सन्निपातज्वरन्तथा ॥ ४६ ॥ असाध्यञ्च ज्वरं हन्ति यथा सूर्योदयस्तमः । गरुडञ्च समालोक्य यथा सर्पः पलायते ॥ ४७ ॥ तथैवास्य प्रसादेन ज्वरः शीघ्रं पलायते । बलदं पुष्टिदञ्चैव मन्दाग्निनाशनं परम् ॥ ४८ ॥

भाषाटीकासहित । ( १७७ ) वीर्यस्तम्भकरश्चैव कामलापाण्डुरोगनुत् । सदा तु रमते नारीं न वीर्यं क्षीणतां व्रजेत् ॥ ४९ ॥ प्रमेहं विविधञ्चैव विविधां ग्रहणीं तथा । अनुपानविशेषेण सर्वव्याधिं विनाशयेत् ॥ ३५० ॥ इस औषधिके विधिपूर्वक सेवन करनेसे अन्तर्धातुगत ज्वर, भूतोत्थ ज्वर, श्रमजनित ज्वर, सांनिपातिक ज्वर और असाध्य ज्वर यह सब शीघ्र नष्ट होजाते हैं । जिस प्रकार सूर्योदयके होनेसे अन्धकारका समूह नष्ट होजाता है, जिस प्रकार गरुड़को देखकर सर्प दूर भाग जाते हैं उसी प्रकार इस औषधिके प्रसादसे ज्वर शीघ्र ही नष्ट होजाता है। यह अत्यंत बलकारक, पुष्टिजनक, मन्दाग्निनाशक, वीर्यस्तम्भक, कामला और पाण्डुरोगको दूर करनेवाला है। इस औषधिके सेवन करनेसे सदैव स्त्रियोंके साथ रमण करनेपर भी वीर्य क्षय नहीं होता। यह औषधि अनेक प्रकारके प्रमेह और सब प्रकारके ग्रहणीरोगको दूर करती है। यथायोग्य अनुपानके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे समस्त रोग नष्ट होते हैं। इसको बृहज्ज्वरान्तक लोह कहते हैं ॥ ३४६-३५० ॥ चूडामणि रस । मृतं सूतं प्रवालञ्च स्वर्णं तारञ्च वङ्गकम् । शुल्वं मुक्ता तीक्ष्णमभ्रं सर्वमेकत्र योजयेत् ॥ ५१ ॥ जलेन पिष्ट्वा वटिका कार्या वल्लप्रमाणतः । धातुस्थं सन्निपातोत्थं ज्वरं विषमसम्भवम् ॥ ५२ ॥ कामशोकसमुद्भूतं त्रिदोषजनितं तथा । कासं श्वासञ्च विविधं शूलं सर्वाङ्गसम्भवम् ॥५३॥ शिरोरोगं कर्णशूलं दन्तशूलं गलग्रहम् । वातपित्तसमुद्भूतं ग्रहणीं सर्वसम्भवाम् ॥ ५४ ॥

( १७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आमवातं कटीशूलमग्निमान्द्यं विषूचिकाम् । अर्शांसि कामलां मेहं मूत्रकृच्छ्रादिकञ्च यत् ॥ ५५॥ तत्सर्वं नाशयत्याशु विष्णुचक्रमिवासुरान् । चूडामणिरसो ह्येष शिवेन परिकीर्त्तितः ॥ ५६ ॥ पारदभस्म या रससिन्दूर तथा मूंगा, सोना, चांदी, वंग, तांबा, मोती, लोहा और अभ्रक इन सबकी भस्म समान भाग लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बनावे । यथायोग्य अनुपानके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे धातुगत, सान्निपातिक ज्वर, विषमज्वर, कामज और शोकज ज्वर, त्रिदोषजनित ज्वर, विविध प्रकारकी

  • खाँसी, श्वास, सर्वशरीरगत शूल, शिरोरोग, कर्णरोग, दन्तशूल, वातपित्तजन्य गलग्रह, सर्वदोषजनित ग्रहणी, आमवात, कटिशूल, मंदाग्नि, विषूचिका, अर्श, कामला, प्रमेह और मूत्रकृच्छादि समस्त रोग नष्ट होजाते हैं, जिस प्रकार विष्णुके चक्रसे दैत्योंका समूह नष्ट होता है । यह चूडामणि रस स्वयं महादेवजीने कहा है ॥ ५१-५६ ॥ भानुचूडामणि रस । सुवर्णं रससिन्दूरं प्रवालं वङ्गमेव च । लौहं ताम्रं तेजपत्रं यमानी विश्वभेषजम् ॥ ५७ ॥ सैन्धवं मरिचं कुष्ठं खदिरं द्विहरिद्रकम् । रसाञ्जनं माक्षिकञ्च समभागं च कारयेत् ॥ ५८ ॥ वारिणा वटिका कार्या रक्तिद्वयप्रमाणतः । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ ५९ ॥ सुवर्णभस्म, रससिंदूर, मूंगेकी भस्म, वंगभस्म, लोहभस्म, तांबेकी भस्म, तेजपात, अजवायन, सोंठ, सेंधानमक, कालीमिरच, कूठ, कत्था, हलदी, दारुहलदी, रसौत और सोनामाखी भस्म इन सब औष-

भाषाटीकासहित । ( १७९ ) धियोंको समान भाग लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस रसका उचित अनुपानसे सेवन करे तो सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं ॥ ५७–५९ ॥ बृहच्चूडामणि रस ! कस्तूरिका विद्रुमरौप्यलोहं तालं हिरण्यं रससिंधु- रञ्च । सुवर्णसिन्दूरलवङ्गमौक्तिकं चोचं घनं माक्षि- करराजपट्टम् ॥ ३६० ॥ गोक्षूरजातीफलजातिकोषं मरीचकपूर्रशिखिग्रीवञ्च । प्रगृह्य सर्वं हि समं प्रयत्नादथाश्वगन्धां द्विगुणां हि वैद्यः ॥ ६१ ॥ वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं मुनिसंख्यया । निर्गुण्डीफञ्जिकावासारविमूलत्रिकण्टकैः ॥ ६२ ॥ कस्तूरी, मूंगेकी भस्म, रूपेकी भस्म, लोहभस्म, हरितालभस्म, सोनेकी भस्म, रससिन्दूर, स्वर्णसिन्दूर, लौंग, मोतीकी भस्म, दार- चीनी, नागरमोथा, सोनामाखीभस्म, राजपट्टभस्म, गोखुरु, जायफल, जावित्री, काली मिरच, कपूर और शुद्ध तूतिया यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, असगंध दो भाग इन सबको एकत्र पीसकर सम्हा- लूके पत्ते, भारंगीकी जड़, अडूसेके पत्ते, आककी जड़ और गोखुरु इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इसकी मात्रा दो रत्तीकी है ॥ ३६०–३६२ ॥ तद्वीर्यं कथयिष्यामि वातिकं पैत्तिकं ज्वरम् । कफोद्भवं द्विदोषोत्थं त्रिदोषज्जनितं तथा ॥ ६३ ॥ सन्ततं सततं हन्ति तृतीयकचतुर्थकौ । ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च विषमं भूतसम्भवम् ॥ ६४ ॥ नाशयेदचिरादेव वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा । चूडामणिरसो ह्येष शिवेन परिभाषितः ॥ ६५ ॥

( १८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इस औषधिके सेवन करनेसे वातिकज्वर, पैत्तिकज्वर, कफज्वर, त्रिदोषज्वर, द्विदोषज्वर, सन्ततज्वर, सततज्वर, तृतीयकज्वर, चातु- र्थिकज्वर, ऐकाहिकज्वर, द्वयाहिकज्वर, विषमज्वर और भूतोत्पन्न ज्वर यह सब वज्राहत वृक्षके समान नष्ट होजाते हैं । इसको शिवजीने बृहत् चूडामणि रस कहा है ॥ ६३-६५ ॥ बृहज्ज्वरचूडामणि रस । सुवर्णसिन्दुरं स्वर्णं लोहं तारं मृगाङ्ककम् । जातीफलं जातिकोषं लवंगञ्च त्रिकण्टकम् ॥ ६६ ॥ कर्पूरं गगनञ्चैव चोचं मूसलतालकम् । प्रत्येकं कर्षमानन्तु तुरङ्गञ्च द्विकार्षिकम् ॥ ६७ ॥ विद्रुमं भस्मसूतञ्च मौक्तिकं माक्षिकं तथा । राजपट्टं शिखिग्रीवं सर्वं सञ्चूर्णय यत्नतः ॥ ६८ ॥ खल्ले तु चूर्णमादाय भावयेत्परिकीर्तितैः । निर्गुण्डीफञ्जिकावासारविमूलत्रिकण्टकैः ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापिवा ॥ ६९ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ज्वराधिकारः । सुवर्णसिन्दूर, सोनेकी भस्म, लोहेकी भस्म, रुपेकी भस्म, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, लौंग, गोखुरु, कपूर, अभ्रकभस्म, दारचीनी और मुसली यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, गंधक दो तोला, मूंगेकी भस्म, रससिन्दूर, मोती, सोनामाखी, राजपट्टभस्म और शुद्ध तूतिया यह प्रत्येक दो दो तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सम्हालूके पत्ते, भारंगीकी जड़, अडूसेके पत्ते, आककी जड़ और गोखुरु इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य आठ प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । इसको बृहज्ज्वरचूडामणि रस कहते हैं ॥ ३६६-३६९ ॥ इति ज्वराधिकार ॥

भाषाटीकासहित । ( १८१ ) अथ ज्वरातिसारचिकित्सा । मृतसञ्जीवनी वटी । मागधी वत्सनाभश्च तयोस्तुल्यञ्च हिङ्गुलम् । मृतसञ्जीवनी ख्याता जम्बीररसमर्दिता ॥ १ ॥ मूलकस्य च बीजानां वटिका तुल्यरूपिणी । पानीया शीततोयेन ज्वरातीसारनाशिनी ॥ विषूच्यां सन्निपाते च ज्वरे चैवातिदुस्तरे ॥ २ ॥ पीपल एक भाग, विष एक भाग और सिंग्रफ दो भाग लेवे; इन सब औषधियोंको जम्भीरी नींबूके रसमें पीसकर मूलीके बीजोंकी बराबर गोलियां बना लेवे । इस औषधिको शीतल जलके साथ सेवन करनेसे ज्वरातिसार, विषूचिका, दुस्तर ज्वर और सन्निपात नष्ट होते हैं । इसे मृतसञ्जीवनी वटी कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ आनन्दभैरव रस । हिङ्गुलञ्च विषं व्योषं टङ्कणं गन्धकं समम् । जम्बीररससंयुक्तं मर्दयेद् यामकद्वयम् ॥ ३ ॥ कासश्वासातिसारेषु ग्रहण्यां सान्निपातिके । अपस्मारेऽनिले मेहेऽप्यजीर्णे वह्निमान्द्यके ॥ गुञ्जामात्रः प्रदातव्यो रस आनन्दभैरवः ॥ ४ ॥ सिंग्रफ, विष, सोंठ, पिप्पली, मिर्च, सुहागा और गन्धक समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कास, श्वास, अतिसार, संग्रहणी, सन्निपात, अपस्मार, वातरोग, प्रमेह और अजीर्ण तथा मन्दाग्नि आदि सब रोग नष्ट होते हैं । इसको आनन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥

( १८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ! अमृतार्णव । हिंगुलोत्थो रसो लोहं टंकणं गन्धकं शटी । धान्यकं बालकं मुस्तं पाठा जीरं घुणप्रिया ॥ ५ ॥ प्रत्येकं तोलकं चूर्णं छागीदुग्धेन पेषयेत् । माषैका वटिका कार्या रसोऽयममृतार्णवः ॥ ६ ॥ वटिकां भक्षयेत्प्रातर्गहनानन्दभाषिताम् । धान्यजीरकयूषेण विजयाशणबीजतः ॥ ७ ॥ मधुना छागदुग्धेन मण्डेन शीतवारिणा । कदलीमोचकरसैः कञ्चटद्रवकेण च ॥ ८ ॥ अतिसारं जयेदुग्रमेकजं द्वन्द्वजं तथा । दोषत्रयसमुद्भूतमुपसर्गसमन्वितम् ॥ ९ ॥ शूलघ्नो वह्निजननो ग्रहण्यर्शोविकारनुत् । अम्लपित्तप्रशमनः कासघ्नो गुल्मनाशनः ॥ १० ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा, लोहभस्म, सुहागा, गन्धक, कचूर, धनिया, सुगंधवाला, नागरमोथा, पाठ, जीरा और अतीस यह सब एक एक तोला लेकर बकरीके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस गोलीको प्रातःकाल भक्षण करे और ऊपरसे धनिया और जीरेके साथ मूंगका यूष, भांग, सनके बीज, सहत, बकरीका दूध, मांड, शीतल जल, केले और मोचेका रस या जल, पीपलके रसके साथ सेवन करनेसे एकदोषज अतिसार, द्विदोपज अतिसार, त्रिदोषज अतिसार, समस्त उपद्रवों सहित अतिसार, शूल, म न्दाग्नि संग्रहणी, बवासीर, अम्लपित्त, खाँसी और गुल्मरोग नष्ट होते हैं । इसको गहनानन्दने कहा है, इसको अमृतार्णव रस कहते हैं ॥५-१०॥

भाषाटीकासहित । ( १८३ ) सिद्धप्राणेश्वर रस । गन्धेशाभ्रं पृथग्वेदभागमन्यच्च भागिकम् । स्वर्जिटंकयवक्षाराः पञ्चैव लवणानि च ॥ ११ ॥ वराव्योषेन्द्रबीजानि द्विजीराग्नियमानिका । सहिंगुबीजसारञ्च शतपुष्पा सुचूर्णिता ॥ १२ ॥ सिद्धप्राणेश्वरः सूतः प्राणिनां प्राणदायकः । माषकं भक्षयेदस्य नागवल्लीदलैर्युतम् ॥ १३ ॥ उष्णोदकानुपानञ्च दद्यात्तत्र पलत्रयम् । ज्वरे त्रिदोषजे घोरे ग्रहण्यादिगदेऽपि च ॥ १४ ॥ ज्वरातिसारेऽतिसृतौ केवले वा ज्वरेऽपिवा। वातरोगे तथा शूले शूले च परिणामजे ॥ १५ ॥ गंधक, पारा और अभ्रक भस्म प्रत्येक चार चार भाग, सज्जीखार, सुहागा, जवारखार, पांचों लवण, त्रिफला, त्रिकुटा, इन्द्रजौ, जीरा, काला जीरा, चित्रक, अजवायन, हींग, वायविडंग और सौंफ यह समस्त औषधि समान भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक मासे औषधि पानके रसके साथ सेवन करे । औषधि सेवनके अन्तमें १२ तोले परिमाण गरम जल पान करना चाहिये । इसके सेवन करनेसे ज्वरातिसार, अतिसार, ज्वर, घोरतर सन्निपात ज्वर, संग्रहणी, वातरोग, शूल और परिणामशूल नष्ट होते हैं । यह औषधि मनुष्योंके जीवनकी रक्षा करनेवाली है । इसको सिद्धप्राणेश्वर रस कहते हैं ॥ ११-१५ ॥ अभ्रवाटिका । अथ शुद्धस्य सूतस्य गन्धकस्याभ्रकस्य च । प्रत्येकं कर्षमानन्तु ग्राह्यं रसगुणैषिणा ॥ १६॥

( १८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ततः कज्जलिकां कृत्वा व्योषचूर्णं प्रदापयेत् । केशराजस्य भृङ्गस्य निर्गुण्ड्याश्चित्रकस्य च॥१७॥ ग्रीष्मसुन्दरकस्याथ जयन्त्याः स्वरसं तथा । मण्डूकपर्ण्याः स्वरसं तथा शक्राशनस्य च ॥१८॥ श्वेतापराजितायाश्च स्वरसं पर्णसम्भवम् । दापयेद्रसतुल्यञ्च विधिज्ञः कुशलो भिषक् ॥ १९॥ रसतुल्यं प्रदातव्यं चूर्णं मरिचसम्भवम् । देयं रसार्द्धभागेन चूर्णं टंकणसम्भवम् ॥ २० ॥ शुभे शिलामये पात्रे घर्षणीयं प्रयत्नतः । शुष्कमातपसंयोगाद्वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २१ ॥ कलायपरिमाणन्तु खादेत्तां तु प्रयत्नतः । दृष्ट्वा वयश्चाग्निबलं यथाव्याध्यनुपानतः ॥ २२ ॥ हन्ति कासं क्षयं श्वासं वातश्लेष्मभवं रुजम् । परं वाजीकरः श्रेष्ठो बलवर्णाग्निवर्द्धकः ॥ २३ ॥ ज्वरे चैवातिसारे च सिद्ध एष प्रयोगराट् । नातः परतरः श्रेष्ठो विद्यतेऽभ्ररसायनात् ॥ २४ ॥ भोजने शयने पाने नास्त्यत्र नियमः क्वचित् । दधि चावश्यकं भक्ष्यं प्राह नागार्जुनो मुनिः॥२५॥ शुद्ध पारा १ तोला, गंधक १ तोला और अभ्रक भस्म १ तोला इन सब औषधियोंको एकत्र करके कजली बनावे । फिर इसमें एक तोला परिमाण त्रिकुटेका चूर्ण डालकर पश्चात् कुकुरभांगरा, भांगरा, सम्हालू, चित्रककी जड़, ग्रीष्मसुन्दर, जयंती, ब्राह्मी, भांग, सफेद कोयली और पान इन प्रत्येकका स्वरस एक एक तोला लेकर

भाषाटीकासहित । ( १८५ ) प्रत्येकके रसमें अलग अलग भावना देवे । फिर इसमें एक तोला कालीमिरचोंका चूर्ण और सुहागा छः मासे इन सबको मिलाकर रगड़े, फिर धूपमें सुखा लेवे और मटरके समान इसकी गोली बना लेवे । रोगीकी आयु, अग्नि और बलाबलका विचार कर यथायोग्य अनु- पानके साथ प्रयोग करनेसे खाँसी, क्षय, श्वास और वातकफजनित पीड़ा दूर होती है । वाजीकरणमें इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इससे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है, ज्वर और अती- साररोगकी यह सिद्ध औषधि है । रसायन कार्यमें इस औषधिसे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इस औषधिके भक्षण करनेसे भोजन और शयनादिका कुछ परिहार नहीं है । इसपर अवश्य दही भक्षण करना चाहिये । इस औषधिको नागार्जुन मुनिने कहा है। इसको अभ्रवाटिका कहते हैं ॥ १६-२५ ॥ कनकसुन्दर रस । हिंगुलं मरिचं गन्धं टंकणं पिप्पली विषम् । कनकस्य च बीजानि समांशं विजयाद्रवैः ॥ २६ ॥ मर्दयेद्याममात्रन्तु चणमात्रा वटी कृता । भक्षणाद्ग्रहणीं हन्ति रसः कनकसुन्दरः । अग्निमान्द्यं ज्वरं तीव्रमतिसारञ्च नाशयेत् ॥ २७ ॥ सिंग्रफ, कालीमिरच, गंधक, सुहागा, पीपल, विष और काले धतूरेके बीज यह सब औषधि समान भाग लेव; पश्चात् भांगके पत्तोंके रसमें एक प्रहर उत्तम रीतिसे खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके भक्षण करनेसे संग्रहणी, मंदाग्नि ज्वर और अतीसार रोग नष्ट होते हैं । इसको कनकसुन्दर रस कहते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ कनकप्रभा । सुवर्णबीजं मरिचं मरालपादं कणा टंकणकं विषञ्च । गन्धं जयाद्भिर्दिवसं विमर्द्य गुञ्जाप्रमाणां वटिकां

( १८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विदध्यात् ॥ २८ ॥ एषाऽतिसारग्रहणीं ज्वराग्नि- मान्द्यं निहन्यात्कनकप्रभेयम् । दध्योदनं भोज्य- मनुष्णवारि मांसं भजेत्तित्तिरिलावकानाम्॥२९॥ काले धतूरेके बीज, कालीमिरच, सिंगरफ, पीपल, सुहागा, विष और गंधक यह सब औषधि सामन भाग लेकर भांगके पत्तोंके रसमें एक दिवस खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अतीसार, संग्रहणी, ज्वर और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसके सेवन करनेके अंतमें दही भात, शितल जल, तीतरका मांस और लवेका मांस इनका पथ्य देवे । इसको कनकप्रभा वटी कहते हैं ॥ २८॥२९॥ कारुण्यसागर रस । भस्मसूताद्धिधा गन्धं तथा द्वित्वं मृताभ्रकम् । दिनं सार्षपतैलेन पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् ॥ ३० ॥ रसैर्मार्गवमूलोत्थैः पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् । त्रिक्षारपञ्चलवणविषाव्योषाग्निजीरकैः ॥ ३१ ॥ सविडङ्गैस्तुल्यभागैरयं कारुण्यसागरः । माषमात्रं ददीतास्य भिषक् सर्वातिसारके ॥ ३२ ॥ सज्वरे विज्वरे वापि सशूले शोणितोद्भवे । निरामे शोथयुक्ते वा ग्रहण्यां सान्निपातिके । अनुपानं विनाप्येष कार्यसिद्धिं करिष्यति ॥३३॥ पारदभस्म या रससिन्दूर १ भाग, गंधक २ भाग और अभ्रकभस्म ४ भाग लेवे; इन सबको एकत्र करके एक दिनतक सरसोंके तेलमें खरल करे । फिर एक प्रहर वालुकायंत्रमें पकावे, फिर भांगरेके रसमें पीसकर वालुकायंत्र में एक प्रहरतक पकावे; तदनंतर सज्जी, जवाखार, सुहागा, विडनमक, सेंधानमक, समुद्रनमक, कालानमक, रोमक लवण, विष,

भाषाटीकासहित । ( १८७ ) सोंठ, पीपल, कालीमिरच, चित्रककी जड़, जीरा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग ले सबको एकत्र पीसकर पूर्वोक्त औष- धिमें मिला देवे। इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर सब प्रकारके अतिसारोंमें प्रयोग करना चाहिये । इससे ज्वरातिसार,अतिसार,शूला- तिसार, रक्तातिसार,निरामातिसार, शोथयुक्तातिसार, त्रिदोषज ग्रहणी और सब प्रकारके गुदज रोग नष्ट होते हैं । यह औषधि विना अनु- पानकेभी कार्यको सिद्ध कर सकती है ॥ ३०-३३ ॥ बृहत्कनकसुन्दर रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मरिचं टङ्कणं तथा । स्वर्णबीजं समं मर्द्यं भार्ङ्गीद्रावैर्दिनार्द्धकम् ॥ ३४ ॥ सूततुल्यं मृतञ्चाभ्रं रसः कनकसुन्दरः । अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति पित्तातीसारमुग्रकम् ॥ ३५ ॥ पारा, गंधक, कालीमिरच, सुहागा और धतूरेके बीज यह सब औषधि समान भाग लेकर भारंगीकी जड़के रसमें दो प्रहर तक खरल करे, फिर पारेकी बराबर इसमें अभ्रकभस्म मिलाकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इससे उग्र पित्तातिसार नष्ट होता है । इसको बृहत्कनकसुंदर रस कहते हैं ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ मृतसञ्जीवन रस । रसगन्धौ समौ ग्राह्यौ सूतपादं विषं क्षिपेत् । सर्वतुल्यं मृतञ्चाभ्रं मर्द्यं धूस्तूरजैर्द्रवैः ॥ ३६ ॥ सर्पाक्ष्याश्च द्रवैर्यामं कषायेणाथ भावयेत् । धातक्यतिविषा मुस्तं शुण्ठी जीरकवालकम् ॥३७॥ यमानी धान्यकं बिल्वं पाठा पथ्या कणान्वितम् ॥ कुटजस्य त्वचं बीजं कपित्थं बालदाडिमम् ॥३८॥

( १८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रत्येकं कर्षमात्रं स्यात्कुट्टितं क्वाथयेज्जलैः । चतुर्गुणं जलं दत्त्वा यावत्पादावशेषितम् ॥ ३९ ॥ अनेन त्रिदिनं भाव्यं पूर्वोक्तं मर्दितं रसम् । रुद्ध्वा तद्वालुकायन्त्रे क्षणं मृद्वग्निना पचेत् ॥ ४० ॥ मृतसञ्जीवनो नाम चास्य गुञ्जाचतुष्टयम् । दातव्यमनुपानेन चासाध्यमपि साधयेत् ॥ षट्प्रकारमतीसारं साध्यासाध्यं जयेद् ध्रुवम् ॥ ४१ ॥ पारा दो तोले, गंधक दो तोले, विष छः मासे, अभ्रकभस्म साढ़े चार तोले इन सब औषधियोंको एकत्र करके धतूरेके पत्तोंके रसमें एक प्रहरतक और सर्पाक्षीके रसमें एक प्रहर तक खरल करे । फिर इसमें धायके फूल १ तोला, अतीस १ तोला, नागरमोथा १ तोला, सोंठ १ तोला, जीरा १ तोला, सुगंधवाला १ तोला, अजवायन १ तोला, धनिया १ तोला, बेलगिरी १ तोला, पाठ एक तोला,हरड़ एक तोला, पीपल एक तोला, कुड़ेकी छाल एक तोला, इन्द्रजौ एक तोला, कैथ एक तोला और कच्चा अनार एक तोला लेकर उत्तम रीतिसे कूटकर सम्पूर्ण द्रव्योंसे चौगुने जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई जल बाकी रह जाये तब उतारकर छान लेवे; फिर इस क्वाथकी उपरोक्त औषधिमें तीन बार भावना देवे । फिर एक हांड़ीमें रखकर ऊपरसे एक छोटेसे सिकोरेके साथ हांड़ीके मध्यमें ही औष- धिको ढक देवे और उसकी संधियोंको अच्छे प्रकारसे बंद करके उसके ऊपर बालू भर देवे । पश्चात् मंद मंद अग्निसे दो घड़ी तक पकावे । फिर अपने आप शीतल होजाने पर औषधि निकाल लेवे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे असाध्य अतिसार भी नष्ट होजाता है । इससे साध्य और असाध्य छः प्रकारका अतिसार निश्चय ही दूर होजाता है । इसको मृतसंजीवन रस कहते हैं ॥ ३६-४१ ॥