रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १८१ ) अथ ज्वरातिसारचिकित्सा । मृतसञ्जीवनी वटी । मागधी वत्सनाभश्च तयोस्तुल्यञ्च हिङ्गुलम् । मृतसञ्जीवनी ख्याता जम्बीररसमर्दिता ॥ १ ॥ मूलकस्य च बीजानां वटिका तुल्यरूपिणी । पानीया शीततोयेन ज्वरातीसारनाशिनी ॥ विषूच्यां सन्निपाते च ज्वरे चैवातिदुस्तरे ॥ २ ॥ पीपल एक भाग, विष एक भाग और सिंग्रफ दो भाग लेवे; इन सब औषधियोंको जम्भीरी नींबूके रसमें पीसकर मूलीके बीजोंकी बराबर गोलियां बना लेवे । इस औषधिको शीतल जलके साथ सेवन करनेसे ज्वरातिसार, विषूचिका, दुस्तर ज्वर और सन्निपात नष्ट होते हैं । इसे मृतसञ्जीवनी वटी कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ आनन्दभैरव रस । हिङ्गुलञ्च विषं व्योषं टङ्कणं गन्धकं समम् । जम्बीररससंयुक्तं मर्दयेद् यामकद्वयम् ॥ ३ ॥ कासश्वासातिसारेषु ग्रहण्यां सान्निपातिके । अपस्मारेऽनिले मेहेऽप्यजीर्णे वह्निमान्द्यके ॥ गुञ्जामात्रः प्रदातव्यो रस आनन्दभैरवः ॥ ४ ॥ सिंग्रफ, विष, सोंठ, पिप्पली, मिर्च, सुहागा और गन्धक समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कास, श्वास, अतिसार, संग्रहणी, सन्निपात, अपस्मार, वातरोग, प्रमेह और अजीर्ण तथा मन्दाग्नि आदि सब रोग नष्ट होते हैं । इसको आनन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥