रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ! अमृतार्णव । हिंगुलोत्थो रसो लोहं टंकणं गन्धकं शटी । धान्यकं बालकं मुस्तं पाठा जीरं घुणप्रिया ॥ ५ ॥ प्रत्येकं तोलकं चूर्णं छागीदुग्धेन पेषयेत् । माषैका वटिका कार्या रसोऽयममृतार्णवः ॥ ६ ॥ वटिकां भक्षयेत्प्रातर्गहनानन्दभाषिताम् । धान्यजीरकयूषेण विजयाशणबीजतः ॥ ७ ॥ मधुना छागदुग्धेन मण्डेन शीतवारिणा । कदलीमोचकरसैः कञ्चटद्रवकेण च ॥ ८ ॥ अतिसारं जयेदुग्रमेकजं द्वन्द्वजं तथा । दोषत्रयसमुद्भूतमुपसर्गसमन्वितम् ॥ ९ ॥ शूलघ्नो वह्निजननो ग्रहण्यर्शोविकारनुत् । अम्लपित्तप्रशमनः कासघ्नो गुल्मनाशनः ॥ १० ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा, लोहभस्म, सुहागा, गन्धक, कचूर, धनिया, सुगंधवाला, नागरमोथा, पाठ, जीरा और अतीस यह सब एक एक तोला लेकर बकरीके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस गोलीको प्रातःकाल भक्षण करे और ऊपरसे धनिया और जीरेके साथ मूंगका यूष, भांग, सनके बीज, सहत, बकरीका दूध, मांड, शीतल जल, केले और मोचेका रस या जल, पीपलके रसके साथ सेवन करनेसे एकदोषज अतिसार, द्विदोपज अतिसार, त्रिदोषज अतिसार, समस्त उपद्रवों सहित अतिसार, शूल, म न्दाग्नि संग्रहणी, बवासीर, अम्लपित्त, खाँसी और गुल्मरोग नष्ट होते हैं । इसको गहनानन्दने कहा है, इसको अमृतार्णव रस कहते हैं ॥५-१०॥