भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

भाषाटीकासहित । ( १८३ ) सिद्धप्राणेश्वर रस । गन्धेशाभ्रं पृथग्वेदभागमन्यच्च भागिकम् । स्वर्जिटंकयवक्षाराः पञ्चैव लवणानि च ॥ ११ ॥ वराव्योषेन्द्रबीजानि द्विजीराग्नियमानिका । सहिंगुबीजसारञ्च शतपुष्पा सुचूर्णिता ॥ १२ ॥ सिद्धप्राणेश्वरः सूतः प्राणिनां प्राणदायकः । माषकं भक्षयेदस्य नागवल्लीदलैर्युतम् ॥ १३ ॥ उष्णोदकानुपानञ्च दद्यात्तत्र पलत्रयम् । ज्वरे त्रिदोषजे घोरे ग्रहण्यादिगदेऽपि च ॥ १४ ॥ ज्वरातिसारेऽतिसृतौ केवले वा ज्वरेऽपिवा। वातरोगे तथा शूले शूले च परिणामजे ॥ १५ ॥ गंधक, पारा और अभ्रक भस्म प्रत्येक चार चार भाग, सज्जीखार, सुहागा, जवारखार, पांचों लवण, त्रिफला, त्रिकुटा, इन्द्रजौ, जीरा, काला जीरा, चित्रक, अजवायन, हींग, वायविडंग और सौंफ यह समस्त औषधि समान भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक मासे औषधि पानके रसके साथ सेवन करे । औषधि सेवनके अन्तमें १२ तोले परिमाण गरम जल पान करना चाहिये । इसके सेवन करनेसे ज्वरातिसार, अतिसार, ज्वर, घोरतर सन्निपात ज्वर, संग्रहणी, वातरोग, शूल और परिणामशूल नष्ट होते हैं । यह औषधि मनुष्योंके जीवनकी रक्षा करनेवाली है । इसको सिद्धप्राणेश्वर रस कहते हैं ॥ ११-१५ ॥ अभ्रवाटिका । अथ शुद्धस्य सूतस्य गन्धकस्याभ्रकस्य च । प्रत्येकं कर्षमानन्तु ग्राह्यं रसगुणैषिणा ॥ १६॥