रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इस औषधिके सेवन करनेसे वातिकज्वर, पैत्तिकज्वर, कफज्वर, त्रिदोषज्वर, द्विदोषज्वर, सन्ततज्वर, सततज्वर, तृतीयकज्वर, चातु- र्थिकज्वर, ऐकाहिकज्वर, द्वयाहिकज्वर, विषमज्वर और भूतोत्पन्न ज्वर यह सब वज्राहत वृक्षके समान नष्ट होजाते हैं । इसको शिवजीने बृहत् चूडामणि रस कहा है ॥ ६३-६५ ॥ बृहज्ज्वरचूडामणि रस । सुवर्णसिन्दुरं स्वर्णं लोहं तारं मृगाङ्ककम् । जातीफलं जातिकोषं लवंगञ्च त्रिकण्टकम् ॥ ६६ ॥ कर्पूरं गगनञ्चैव चोचं मूसलतालकम् । प्रत्येकं कर्षमानन्तु तुरङ्गञ्च द्विकार्षिकम् ॥ ६७ ॥ विद्रुमं भस्मसूतञ्च मौक्तिकं माक्षिकं तथा । राजपट्टं शिखिग्रीवं सर्वं सञ्चूर्णय यत्नतः ॥ ६८ ॥ खल्ले तु चूर्णमादाय भावयेत्परिकीर्तितैः । निर्गुण्डीफञ्जिकावासारविमूलत्रिकण्टकैः ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापिवा ॥ ६९ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ज्वराधिकारः । सुवर्णसिन्दूर, सोनेकी भस्म, लोहेकी भस्म, रुपेकी भस्म, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, लौंग, गोखुरु, कपूर, अभ्रकभस्म, दारचीनी और मुसली यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, गंधक दो तोला, मूंगेकी भस्म, रससिन्दूर, मोती, सोनामाखी, राजपट्टभस्म और शुद्ध तूतिया यह प्रत्येक दो दो तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सम्हालूके पत्ते, भारंगीकी जड़, अडूसेके पत्ते, आककी जड़ और गोखुरु इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य आठ प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । इसको बृहज्ज्वरचूडामणि रस कहते हैं ॥ ३६६-३६९ ॥ इति ज्वराधिकार ॥