रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १७९ ) धियोंको समान भाग लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस रसका उचित अनुपानसे सेवन करे तो सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं ॥ ५७–५९ ॥ बृहच्चूडामणि रस ! कस्तूरिका विद्रुमरौप्यलोहं तालं हिरण्यं रससिंधु- रञ्च । सुवर्णसिन्दूरलवङ्गमौक्तिकं चोचं घनं माक्षि- करराजपट्टम् ॥ ३६० ॥ गोक्षूरजातीफलजातिकोषं मरीचकपूर्रशिखिग्रीवञ्च । प्रगृह्य सर्वं हि समं प्रयत्नादथाश्वगन्धां द्विगुणां हि वैद्यः ॥ ६१ ॥ वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं मुनिसंख्यया । निर्गुण्डीफञ्जिकावासारविमूलत्रिकण्टकैः ॥ ६२ ॥ कस्तूरी, मूंगेकी भस्म, रूपेकी भस्म, लोहभस्म, हरितालभस्म, सोनेकी भस्म, रससिन्दूर, स्वर्णसिन्दूर, लौंग, मोतीकी भस्म, दार- चीनी, नागरमोथा, सोनामाखीभस्म, राजपट्टभस्म, गोखुरु, जायफल, जावित्री, काली मिरच, कपूर और शुद्ध तूतिया यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, असगंध दो भाग इन सबको एकत्र पीसकर सम्हा- लूके पत्ते, भारंगीकी जड़, अडूसेके पत्ते, आककी जड़ और गोखुरु इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इसकी मात्रा दो रत्तीकी है ॥ ३६०–३६२ ॥ तद्वीर्यं कथयिष्यामि वातिकं पैत्तिकं ज्वरम् । कफोद्भवं द्विदोषोत्थं त्रिदोषज्जनितं तथा ॥ ६३ ॥ सन्ततं सततं हन्ति तृतीयकचतुर्थकौ । ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च विषमं भूतसम्भवम् ॥ ६४ ॥ नाशयेदचिरादेव वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा । चूडामणिरसो ह्येष शिवेन परिभाषितः ॥ ६५ ॥