रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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( १७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आमवातं कटीशूलमग्निमान्द्यं विषूचिकाम् । अर्शांसि कामलां मेहं मूत्रकृच्छ्रादिकञ्च यत् ॥ ५५॥ तत्सर्वं नाशयत्याशु विष्णुचक्रमिवासुरान् । चूडामणिरसो ह्येष शिवेन परिकीर्त्तितः ॥ ५६ ॥ पारदभस्म या रससिन्दूर तथा मूंगा, सोना, चांदी, वंग, तांबा, मोती, लोहा और अभ्रक इन सबकी भस्म समान भाग लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बनावे । यथायोग्य अनुपानके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे धातुगत, सान्निपातिक ज्वर, विषमज्वर, कामज और शोकज ज्वर, त्रिदोषजनित ज्वर, विविध प्रकारकी
- खाँसी, श्वास, सर्वशरीरगत शूल, शिरोरोग, कर्णरोग, दन्तशूल, वातपित्तजन्य गलग्रह, सर्वदोषजनित ग्रहणी, आमवात, कटिशूल, मंदाग्नि, विषूचिका, अर्श, कामला, प्रमेह और मूत्रकृच्छादि समस्त रोग नष्ट होजाते हैं, जिस प्रकार विष्णुके चक्रसे दैत्योंका समूह नष्ट होता है । यह चूडामणि रस स्वयं महादेवजीने कहा है ॥ ५१-५६ ॥ भानुचूडामणि रस । सुवर्णं रससिन्दूरं प्रवालं वङ्गमेव च । लौहं ताम्रं तेजपत्रं यमानी विश्वभेषजम् ॥ ५७ ॥ सैन्धवं मरिचं कुष्ठं खदिरं द्विहरिद्रकम् । रसाञ्जनं माक्षिकञ्च समभागं च कारयेत् ॥ ५८ ॥ वारिणा वटिका कार्या रक्तिद्वयप्रमाणतः । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ ५९ ॥ सुवर्णभस्म, रससिंदूर, मूंगेकी भस्म, वंगभस्म, लोहभस्म, तांबेकी भस्म, तेजपात, अजवायन, सोंठ, सेंधानमक, कालीमिरच, कूठ, कत्था, हलदी, दारुहलदी, रसौत और सोनामाखी भस्म इन सब औष-