रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( १७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आमवातं कटीशूलमग्निमान्द्यं विषूचिकाम् । अर्शांसि कामलां मेहं मूत्रकृच्छ्रादिकञ्च यत् ॥ ५५॥ तत्सर्वं नाशयत्याशु विष्णुचक्रमिवासुरान् । चूडामणिरसो ह्येष शिवेन परिकीर्त्तितः ॥ ५६ ॥ पारदभस्म या रससिन्दूर तथा मूंगा, सोना, चांदी, वंग, तांबा, मोती, लोहा और अभ्रक इन सबकी भस्म समान भाग लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बनावे । यथायोग्य अनुपानके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे धातुगत, सान्निपातिक ज्वर, विषमज्वर, कामज और शोकज ज्वर, त्रिदोषजनित ज्वर, विविध प्रकारकी
- खाँसी, श्वास, सर्वशरीरगत शूल, शिरोरोग, कर्णरोग, दन्तशूल, वातपित्तजन्य गलग्रह, सर्वदोषजनित ग्रहणी, आमवात, कटिशूल, मंदाग्नि, विषूचिका, अर्श, कामला, प्रमेह और मूत्रकृच्छादि समस्त रोग नष्ट होजाते हैं, जिस प्रकार विष्णुके चक्रसे दैत्योंका समूह नष्ट होता है । यह चूडामणि रस स्वयं महादेवजीने कहा है ॥ ५१-५६ ॥ भानुचूडामणि रस । सुवर्णं रससिन्दूरं प्रवालं वङ्गमेव च । लौहं ताम्रं तेजपत्रं यमानी विश्वभेषजम् ॥ ५७ ॥ सैन्धवं मरिचं कुष्ठं खदिरं द्विहरिद्रकम् । रसाञ्जनं माक्षिकञ्च समभागं च कारयेत् ॥ ५८ ॥ वारिणा वटिका कार्या रक्तिद्वयप्रमाणतः । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय सर्वज्वरकुलान्तकृत् ॥ ५९ ॥ सुवर्णभस्म, रससिंदूर, मूंगेकी भस्म, वंगभस्म, लोहभस्म, तांबेकी भस्म, तेजपात, अजवायन, सोंठ, सेंधानमक, कालीमिरच, कूठ, कत्था, हलदी, दारुहलदी, रसौत और सोनामाखी भस्म इन सब औष-
भाषाटीकासहित । ( १७९ ) धियोंको समान भाग लेकर जलमें पीसकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस रसका उचित अनुपानसे सेवन करे तो सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं ॥ ५७–५९ ॥ बृहच्चूडामणि रस ! कस्तूरिका विद्रुमरौप्यलोहं तालं हिरण्यं रससिंधु- रञ्च । सुवर्णसिन्दूरलवङ्गमौक्तिकं चोचं घनं माक्षि- करराजपट्टम् ॥ ३६० ॥ गोक्षूरजातीफलजातिकोषं मरीचकपूर्रशिखिग्रीवञ्च । प्रगृह्य सर्वं हि समं प्रयत्नादथाश्वगन्धां द्विगुणां हि वैद्यः ॥ ६१ ॥ वक्ष्यमाणौषधैर्भाव्यं प्रत्येकं मुनिसंख्यया । निर्गुण्डीफञ्जिकावासारविमूलत्रिकण्टकैः ॥ ६२ ॥ कस्तूरी, मूंगेकी भस्म, रूपेकी भस्म, लोहभस्म, हरितालभस्म, सोनेकी भस्म, रससिन्दूर, स्वर्णसिन्दूर, लौंग, मोतीकी भस्म, दार- चीनी, नागरमोथा, सोनामाखीभस्म, राजपट्टभस्म, गोखुरु, जायफल, जावित्री, काली मिरच, कपूर और शुद्ध तूतिया यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, असगंध दो भाग इन सबको एकत्र पीसकर सम्हा- लूके पत्ते, भारंगीकी जड़, अडूसेके पत्ते, आककी जड़ और गोखुरु इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इसकी मात्रा दो रत्तीकी है ॥ ३६०–३६२ ॥ तद्वीर्यं कथयिष्यामि वातिकं पैत्तिकं ज्वरम् । कफोद्भवं द्विदोषोत्थं त्रिदोषज्जनितं तथा ॥ ६३ ॥ सन्ततं सततं हन्ति तृतीयकचतुर्थकौ । ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च विषमं भूतसम्भवम् ॥ ६४ ॥ नाशयेदचिरादेव वृक्षमिन्द्राशनिर्यथा । चूडामणिरसो ह्येष शिवेन परिभाषितः ॥ ६५ ॥
( १८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । इस औषधिके सेवन करनेसे वातिकज्वर, पैत्तिकज्वर, कफज्वर, त्रिदोषज्वर, द्विदोषज्वर, सन्ततज्वर, सततज्वर, तृतीयकज्वर, चातु- र्थिकज्वर, ऐकाहिकज्वर, द्वयाहिकज्वर, विषमज्वर और भूतोत्पन्न ज्वर यह सब वज्राहत वृक्षके समान नष्ट होजाते हैं । इसको शिवजीने बृहत् चूडामणि रस कहा है ॥ ६३-६५ ॥ बृहज्ज्वरचूडामणि रस । सुवर्णसिन्दुरं स्वर्णं लोहं तारं मृगाङ्ककम् । जातीफलं जातिकोषं लवंगञ्च त्रिकण्टकम् ॥ ६६ ॥ कर्पूरं गगनञ्चैव चोचं मूसलतालकम् । प्रत्येकं कर्षमानन्तु तुरङ्गञ्च द्विकार्षिकम् ॥ ६७ ॥ विद्रुमं भस्मसूतञ्च मौक्तिकं माक्षिकं तथा । राजपट्टं शिखिग्रीवं सर्वं सञ्चूर्णय यत्नतः ॥ ६८ ॥ खल्ले तु चूर्णमादाय भावयेत्परिकीर्तितैः । निर्गुण्डीफञ्जिकावासारविमूलत्रिकण्टकैः ॥ ज्वरमष्टविधं हन्ति साध्यासाध्यमथापिवा ॥ ६९ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ज्वराधिकारः । सुवर्णसिन्दूर, सोनेकी भस्म, लोहेकी भस्म, रुपेकी भस्म, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, लौंग, गोखुरु, कपूर, अभ्रकभस्म, दारचीनी और मुसली यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला, गंधक दो तोला, मूंगेकी भस्म, रससिन्दूर, मोती, सोनामाखी, राजपट्टभस्म और शुद्ध तूतिया यह प्रत्येक दो दो तोले लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सम्हालूके पत्ते, भारंगीकी जड़, अडूसेके पत्ते, आककी जड़ और गोखुरु इन प्रत्येकके रसमें सात सात भावना देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे साध्य और असाध्य आठ प्रकारके ज्वर नष्ट होते हैं । इसको बृहज्ज्वरचूडामणि रस कहते हैं ॥ ३६६-३६९ ॥ इति ज्वराधिकार ॥
भाषाटीकासहित । ( १८१ ) अथ ज्वरातिसारचिकित्सा । मृतसञ्जीवनी वटी । मागधी वत्सनाभश्च तयोस्तुल्यञ्च हिङ्गुलम् । मृतसञ्जीवनी ख्याता जम्बीररसमर्दिता ॥ १ ॥ मूलकस्य च बीजानां वटिका तुल्यरूपिणी । पानीया शीततोयेन ज्वरातीसारनाशिनी ॥ विषूच्यां सन्निपाते च ज्वरे चैवातिदुस्तरे ॥ २ ॥ पीपल एक भाग, विष एक भाग और सिंग्रफ दो भाग लेवे; इन सब औषधियोंको जम्भीरी नींबूके रसमें पीसकर मूलीके बीजोंकी बराबर गोलियां बना लेवे । इस औषधिको शीतल जलके साथ सेवन करनेसे ज्वरातिसार, विषूचिका, दुस्तर ज्वर और सन्निपात नष्ट होते हैं । इसे मृतसञ्जीवनी वटी कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ आनन्दभैरव रस । हिङ्गुलञ्च विषं व्योषं टङ्कणं गन्धकं समम् । जम्बीररससंयुक्तं मर्दयेद् यामकद्वयम् ॥ ३ ॥ कासश्वासातिसारेषु ग्रहण्यां सान्निपातिके । अपस्मारेऽनिले मेहेऽप्यजीर्णे वह्निमान्द्यके ॥ गुञ्जामात्रः प्रदातव्यो रस आनन्दभैरवः ॥ ४ ॥ सिंग्रफ, विष, सोंठ, पिप्पली, मिर्च, सुहागा और गन्धक समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे कास, श्वास, अतिसार, संग्रहणी, सन्निपात, अपस्मार, वातरोग, प्रमेह और अजीर्ण तथा मन्दाग्नि आदि सब रोग नष्ट होते हैं । इसको आनन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
( १८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ! अमृतार्णव । हिंगुलोत्थो रसो लोहं टंकणं गन्धकं शटी । धान्यकं बालकं मुस्तं पाठा जीरं घुणप्रिया ॥ ५ ॥ प्रत्येकं तोलकं चूर्णं छागीदुग्धेन पेषयेत् । माषैका वटिका कार्या रसोऽयममृतार्णवः ॥ ६ ॥ वटिकां भक्षयेत्प्रातर्गहनानन्दभाषिताम् । धान्यजीरकयूषेण विजयाशणबीजतः ॥ ७ ॥ मधुना छागदुग्धेन मण्डेन शीतवारिणा । कदलीमोचकरसैः कञ्चटद्रवकेण च ॥ ८ ॥ अतिसारं जयेदुग्रमेकजं द्वन्द्वजं तथा । दोषत्रयसमुद्भूतमुपसर्गसमन्वितम् ॥ ९ ॥ शूलघ्नो वह्निजननो ग्रहण्यर्शोविकारनुत् । अम्लपित्तप्रशमनः कासघ्नो गुल्मनाशनः ॥ १० ॥ सिंग्रफसे निकाला हुआ पारा, लोहभस्म, सुहागा, गन्धक, कचूर, धनिया, सुगंधवाला, नागरमोथा, पाठ, जीरा और अतीस यह सब एक एक तोला लेकर बकरीके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस गोलीको प्रातःकाल भक्षण करे और ऊपरसे धनिया और जीरेके साथ मूंगका यूष, भांग, सनके बीज, सहत, बकरीका दूध, मांड, शीतल जल, केले और मोचेका रस या जल, पीपलके रसके साथ सेवन करनेसे एकदोषज अतिसार, द्विदोपज अतिसार, त्रिदोषज अतिसार, समस्त उपद्रवों सहित अतिसार, शूल, म न्दाग्नि संग्रहणी, बवासीर, अम्लपित्त, खाँसी और गुल्मरोग नष्ट होते हैं । इसको गहनानन्दने कहा है, इसको अमृतार्णव रस कहते हैं ॥५-१०॥
भाषाटीकासहित । ( १८३ ) सिद्धप्राणेश्वर रस । गन्धेशाभ्रं पृथग्वेदभागमन्यच्च भागिकम् । स्वर्जिटंकयवक्षाराः पञ्चैव लवणानि च ॥ ११ ॥ वराव्योषेन्द्रबीजानि द्विजीराग्नियमानिका । सहिंगुबीजसारञ्च शतपुष्पा सुचूर्णिता ॥ १२ ॥ सिद्धप्राणेश्वरः सूतः प्राणिनां प्राणदायकः । माषकं भक्षयेदस्य नागवल्लीदलैर्युतम् ॥ १३ ॥ उष्णोदकानुपानञ्च दद्यात्तत्र पलत्रयम् । ज्वरे त्रिदोषजे घोरे ग्रहण्यादिगदेऽपि च ॥ १४ ॥ ज्वरातिसारेऽतिसृतौ केवले वा ज्वरेऽपिवा। वातरोगे तथा शूले शूले च परिणामजे ॥ १५ ॥ गंधक, पारा और अभ्रक भस्म प्रत्येक चार चार भाग, सज्जीखार, सुहागा, जवारखार, पांचों लवण, त्रिफला, त्रिकुटा, इन्द्रजौ, जीरा, काला जीरा, चित्रक, अजवायन, हींग, वायविडंग और सौंफ यह समस्त औषधि समान भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर एक मासे औषधि पानके रसके साथ सेवन करे । औषधि सेवनके अन्तमें १२ तोले परिमाण गरम जल पान करना चाहिये । इसके सेवन करनेसे ज्वरातिसार, अतिसार, ज्वर, घोरतर सन्निपात ज्वर, संग्रहणी, वातरोग, शूल और परिणामशूल नष्ट होते हैं । यह औषधि मनुष्योंके जीवनकी रक्षा करनेवाली है । इसको सिद्धप्राणेश्वर रस कहते हैं ॥ ११-१५ ॥ अभ्रवाटिका । अथ शुद्धस्य सूतस्य गन्धकस्याभ्रकस्य च । प्रत्येकं कर्षमानन्तु ग्राह्यं रसगुणैषिणा ॥ १६॥
( १८४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ततः कज्जलिकां कृत्वा व्योषचूर्णं प्रदापयेत् । केशराजस्य भृङ्गस्य निर्गुण्ड्याश्चित्रकस्य च॥१७॥ ग्रीष्मसुन्दरकस्याथ जयन्त्याः स्वरसं तथा । मण्डूकपर्ण्याः स्वरसं तथा शक्राशनस्य च ॥१८॥ श्वेतापराजितायाश्च स्वरसं पर्णसम्भवम् । दापयेद्रसतुल्यञ्च विधिज्ञः कुशलो भिषक् ॥ १९॥ रसतुल्यं प्रदातव्यं चूर्णं मरिचसम्भवम् । देयं रसार्द्धभागेन चूर्णं टंकणसम्भवम् ॥ २० ॥ शुभे शिलामये पात्रे घर्षणीयं प्रयत्नतः । शुष्कमातपसंयोगाद्वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ २१ ॥ कलायपरिमाणन्तु खादेत्तां तु प्रयत्नतः । दृष्ट्वा वयश्चाग्निबलं यथाव्याध्यनुपानतः ॥ २२ ॥ हन्ति कासं क्षयं श्वासं वातश्लेष्मभवं रुजम् । परं वाजीकरः श्रेष्ठो बलवर्णाग्निवर्द्धकः ॥ २३ ॥ ज्वरे चैवातिसारे च सिद्ध एष प्रयोगराट् । नातः परतरः श्रेष्ठो विद्यतेऽभ्ररसायनात् ॥ २४ ॥ भोजने शयने पाने नास्त्यत्र नियमः क्वचित् । दधि चावश्यकं भक्ष्यं प्राह नागार्जुनो मुनिः॥२५॥ शुद्ध पारा १ तोला, गंधक १ तोला और अभ्रक भस्म १ तोला इन सब औषधियोंको एकत्र करके कजली बनावे । फिर इसमें एक तोला परिमाण त्रिकुटेका चूर्ण डालकर पश्चात् कुकुरभांगरा, भांगरा, सम्हालू, चित्रककी जड़, ग्रीष्मसुन्दर, जयंती, ब्राह्मी, भांग, सफेद कोयली और पान इन प्रत्येकका स्वरस एक एक तोला लेकर
भाषाटीकासहित । ( १८५ ) प्रत्येकके रसमें अलग अलग भावना देवे । फिर इसमें एक तोला कालीमिरचोंका चूर्ण और सुहागा छः मासे इन सबको मिलाकर रगड़े, फिर धूपमें सुखा लेवे और मटरके समान इसकी गोली बना लेवे । रोगीकी आयु, अग्नि और बलाबलका विचार कर यथायोग्य अनु- पानके साथ प्रयोग करनेसे खाँसी, क्षय, श्वास और वातकफजनित पीड़ा दूर होती है । वाजीकरणमें इससे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इससे बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है, ज्वर और अती- साररोगकी यह सिद्ध औषधि है । रसायन कार्यमें इस औषधिसे उत्तम अन्य औषधि नहीं है । इस औषधिके भक्षण करनेसे भोजन और शयनादिका कुछ परिहार नहीं है । इसपर अवश्य दही भक्षण करना चाहिये । इस औषधिको नागार्जुन मुनिने कहा है। इसको अभ्रवाटिका कहते हैं ॥ १६-२५ ॥ कनकसुन्दर रस । हिंगुलं मरिचं गन्धं टंकणं पिप्पली विषम् । कनकस्य च बीजानि समांशं विजयाद्रवैः ॥ २६ ॥ मर्दयेद्याममात्रन्तु चणमात्रा वटी कृता । भक्षणाद्ग्रहणीं हन्ति रसः कनकसुन्दरः । अग्निमान्द्यं ज्वरं तीव्रमतिसारञ्च नाशयेत् ॥ २७ ॥ सिंग्रफ, कालीमिरच, गंधक, सुहागा, पीपल, विष और काले धतूरेके बीज यह सब औषधि समान भाग लेव; पश्चात् भांगके पत्तोंके रसमें एक प्रहर उत्तम रीतिसे खरल करके चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिके भक्षण करनेसे संग्रहणी, मंदाग्नि ज्वर और अतीसार रोग नष्ट होते हैं । इसको कनकसुन्दर रस कहते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥ कनकप्रभा । सुवर्णबीजं मरिचं मरालपादं कणा टंकणकं विषञ्च । गन्धं जयाद्भिर्दिवसं विमर्द्य गुञ्जाप्रमाणां वटिकां
( १८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । विदध्यात् ॥ २८ ॥ एषाऽतिसारग्रहणीं ज्वराग्नि- मान्द्यं निहन्यात्कनकप्रभेयम् । दध्योदनं भोज्य- मनुष्णवारि मांसं भजेत्तित्तिरिलावकानाम्॥२९॥ काले धतूरेके बीज, कालीमिरच, सिंगरफ, पीपल, सुहागा, विष और गंधक यह सब औषधि सामन भाग लेकर भांगके पत्तोंके रसमें एक दिवस खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अतीसार, संग्रहणी, ज्वर और मंदाग्नि नष्ट होती है । इसके सेवन करनेके अंतमें दही भात, शितल जल, तीतरका मांस और लवेका मांस इनका पथ्य देवे । इसको कनकप्रभा वटी कहते हैं ॥ २८॥२९॥ कारुण्यसागर रस । भस्मसूताद्धिधा गन्धं तथा द्वित्वं मृताभ्रकम् । दिनं सार्षपतैलेन पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् ॥ ३० ॥ रसैर्मार्गवमूलोत्थैः पिष्ट्वा यामं विपाचयेत् । त्रिक्षारपञ्चलवणविषाव्योषाग्निजीरकैः ॥ ३१ ॥ सविडङ्गैस्तुल्यभागैरयं कारुण्यसागरः । माषमात्रं ददीतास्य भिषक् सर्वातिसारके ॥ ३२ ॥ सज्वरे विज्वरे वापि सशूले शोणितोद्भवे । निरामे शोथयुक्ते वा ग्रहण्यां सान्निपातिके । अनुपानं विनाप्येष कार्यसिद्धिं करिष्यति ॥३३॥ पारदभस्म या रससिन्दूर १ भाग, गंधक २ भाग और अभ्रकभस्म ४ भाग लेवे; इन सबको एकत्र करके एक दिनतक सरसोंके तेलमें खरल करे । फिर एक प्रहर वालुकायंत्रमें पकावे, फिर भांगरेके रसमें पीसकर वालुकायंत्र में एक प्रहरतक पकावे; तदनंतर सज्जी, जवाखार, सुहागा, विडनमक, सेंधानमक, समुद्रनमक, कालानमक, रोमक लवण, विष,
भाषाटीकासहित । ( १८७ ) सोंठ, पीपल, कालीमिरच, चित्रककी जड़, जीरा और वायविडंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग ले सबको एकत्र पीसकर पूर्वोक्त औष- धिमें मिला देवे। इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर सब प्रकारके अतिसारोंमें प्रयोग करना चाहिये । इससे ज्वरातिसार,अतिसार,शूला- तिसार, रक्तातिसार,निरामातिसार, शोथयुक्तातिसार, त्रिदोषज ग्रहणी और सब प्रकारके गुदज रोग नष्ट होते हैं । यह औषधि विना अनु- पानकेभी कार्यको सिद्ध कर सकती है ॥ ३०-३३ ॥ बृहत्कनकसुन्दर रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मरिचं टङ्कणं तथा । स्वर्णबीजं समं मर्द्यं भार्ङ्गीद्रावैर्दिनार्द्धकम् ॥ ३४ ॥ सूततुल्यं मृतञ्चाभ्रं रसः कनकसुन्दरः । अस्य गुञ्जाद्वयं हन्ति पित्तातीसारमुग्रकम् ॥ ३५ ॥ पारा, गंधक, कालीमिरच, सुहागा और धतूरेके बीज यह सब औषधि समान भाग लेकर भारंगीकी जड़के रसमें दो प्रहर तक खरल करे, फिर पारेकी बराबर इसमें अभ्रकभस्म मिलाकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इससे उग्र पित्तातिसार नष्ट होता है । इसको बृहत्कनकसुंदर रस कहते हैं ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ मृतसञ्जीवन रस । रसगन्धौ समौ ग्राह्यौ सूतपादं विषं क्षिपेत् । सर्वतुल्यं मृतञ्चाभ्रं मर्द्यं धूस्तूरजैर्द्रवैः ॥ ३६ ॥ सर्पाक्ष्याश्च द्रवैर्यामं कषायेणाथ भावयेत् । धातक्यतिविषा मुस्तं शुण्ठी जीरकवालकम् ॥३७॥ यमानी धान्यकं बिल्वं पाठा पथ्या कणान्वितम् ॥ कुटजस्य त्वचं बीजं कपित्थं बालदाडिमम् ॥३८॥
( १८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रत्येकं कर्षमात्रं स्यात्कुट्टितं क्वाथयेज्जलैः । चतुर्गुणं जलं दत्त्वा यावत्पादावशेषितम् ॥ ३९ ॥ अनेन त्रिदिनं भाव्यं पूर्वोक्तं मर्दितं रसम् । रुद्ध्वा तद्वालुकायन्त्रे क्षणं मृद्वग्निना पचेत् ॥ ४० ॥ मृतसञ्जीवनो नाम चास्य गुञ्जाचतुष्टयम् । दातव्यमनुपानेन चासाध्यमपि साधयेत् ॥ षट्प्रकारमतीसारं साध्यासाध्यं जयेद् ध्रुवम् ॥ ४१ ॥ पारा दो तोले, गंधक दो तोले, विष छः मासे, अभ्रकभस्म साढ़े चार तोले इन सब औषधियोंको एकत्र करके धतूरेके पत्तोंके रसमें एक प्रहरतक और सर्पाक्षीके रसमें एक प्रहर तक खरल करे । फिर इसमें धायके फूल १ तोला, अतीस १ तोला, नागरमोथा १ तोला, सोंठ १ तोला, जीरा १ तोला, सुगंधवाला १ तोला, अजवायन १ तोला, धनिया १ तोला, बेलगिरी १ तोला, पाठ एक तोला,हरड़ एक तोला, पीपल एक तोला, कुड़ेकी छाल एक तोला, इन्द्रजौ एक तोला, कैथ एक तोला और कच्चा अनार एक तोला लेकर उत्तम रीतिसे कूटकर सम्पूर्ण द्रव्योंसे चौगुने जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई जल बाकी रह जाये तब उतारकर छान लेवे; फिर इस क्वाथकी उपरोक्त औषधिमें तीन बार भावना देवे । फिर एक हांड़ीमें रखकर ऊपरसे एक छोटेसे सिकोरेके साथ हांड़ीके मध्यमें ही औष- धिको ढक देवे और उसकी संधियोंको अच्छे प्रकारसे बंद करके उसके ऊपर बालू भर देवे । पश्चात् मंद मंद अग्निसे दो घड़ी तक पकावे । फिर अपने आप शीतल होजाने पर औषधि निकाल लेवे । इसमेंसे चार रत्ती परिमाण औषधि यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करनेसे असाध्य अतिसार भी नष्ट होजाता है । इससे साध्य और असाध्य छः प्रकारका अतिसार निश्चय ही दूर होजाता है । इसको मृतसंजीवन रस कहते हैं ॥ ३६-४१ ॥
भाषाटीकासहित । ( १८९ ) नागरादि चूर्ण । नागरातिविषा मुस्तं देवदारु कणा वचा । यमानी वालकं धान्यं कुटजत्वक् हरीतकी ॥ ४२॥ धातकीन्द्रयवौ बिल्वं पाठा मोचरसं समम् । चूर्णितं मधुना लेह्यमनुपानं सुखावहम् ॥ ४३ ॥ सोंठ, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पीपल, वच, अजवायन, सुगंधवाला, धनिया, कुड़ेकी छाल, हरड़, धायके फूल, इन्द्रजौ, बेल- गिरी, पाठ और मोचरस यह सब औषधि समान भाग लेकर चूर्ण करके शहदमें मिला उपरोक्त मृतसंजीवनी गोलीके ऊपर चाटे तो सब अतिसार दूर हों। अथवा यह अकेला चूर्ण भी उचित अनुपानसे सेवन करे तो अतिसार रोगको दूर करता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ प्राणेश्वर रस । रसं गन्धकमभ्रं च टंकणं शतपुष्पकम् । यमानी जीरकाख्यं च प्रत्येकं कर्षयुग्मकम् ॥ ४४॥ कर्षमेकं यवक्षारं हिंगुं पटुकपंचकम् । विडंगेन्द्रयवं सर्जरसकं चाग्निसंज्ञितम् ॥ घृष्ट्वा च वटिका कार्या नाम्ना प्राणेश्वरो रसः॥४५॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ज्वरातिसारचिकित्सा । पारा, गन्धक, अभ्रकभस्म, सुहागा, सौंफ, अजवायन और जीरा यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले,जवाखार एक तोला, हींग,पांचों लवण, वायविडंग, इन्द्रजौ, राल और चित्रककी छाल यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेकर सबको एकत्र पीसकर जलसे एक एक रत्तीकी गोली बना लेव;इसके सेवनसे ज्वर, अतिसार रोग दूर होते हैं । इसको प्राणे- श्वर रस कहते हैं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ इति ज्वरातिसारचिकित्सा ॥
( १९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ अतिसारचिकित्सा । अतिसारवारण रस । दरदं कृतकर्पूरं मुस्तेन्द्रयवसंयुतम् । सर्वातिसारशमनं खाखसीक्षीरभावितम् ॥ १ ॥ सिंग्रफ, पक्ककपूर, नागरमोथा और इन्द्रजौ यह सब औषधि समान भाग लेकर अफीमके पानीकी भावना देवे । इसको यथायोग्य अनुपान और उचित मात्रानुसार सेवन करनेसे सब प्रकारका अतीसार नष्ट होता है । इसको अतिसारवारण रस कहते हैं ॥ १ ॥ पूर्णचन्द्रोदय रस । शुद्धञ्च तालकं लोहं गगनं च पलं पलम् । कर्पूरं पारदं गन्धं प्रत्येकं वटकोन्मितम् ॥ २ ॥ जातीकोषं सुरापत्रं शटी तालीशकेशरम् । व्योषं चोचं कणामूलं लवंगं पिचुसम्मितम् ॥ ३॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चकः । नानारूपमतीसारं ग्रहणीं सर्वरूपिणीम् ॥ ४ ॥ अम्लपित्तं तथा शूलं शूलं च परिणामजम् । रसायनवरश्चायं वाजीकरण उत्तमः ॥ ५ ॥ शुद्ध हरितालभस्म ४ तोले, लोहभस्म ४ तोले, अभ्रकभस्म ४ तोले, कपूर ८ मासे, पारा ८ मासे, गन्धक ८ मासे, जायफल, कपूरकचरी, तेजपात, कचूर, तालीशपत्र, नागकेशर, सोंठ, पीपल, कालीमिरच, दारचीनी, पीपलामूल और लवंग यह प्रत्येक एक एक तोला इन सब औषधियोंको एकत्र करके जलमें पीसकर गोली बनाकर यथा- योग्य मात्रानुसार रोगीको सेवन करावे । गुरु, देवता और ब्राह्म-
भाषाटीकासहित । (१९१) णोंकी पूजा करके प्रातःकाल इस औषधिका सेवन करे । इससे अनेक प्रकारका अतिसार, सर्व प्रकारकी संग्रहणी, अम्लपित्त, शूल और परिणामशूल नष्ट होजाते हैं । यह रसायन और वाजीकरण कर्ममें श्रेष्ठ औषधि है । इसको पूर्णचन्द्रोदयरस कहते हैं ॥ २–५ ॥ कणाद्यलोह । कणानागरपाठाभित्रिवर्गत्रितयेन च । बिल्वचन्दनह्रीबेरैः सर्वातीसारजिद्भवेत् ॥ ६ ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तामपि हन्ति प्रवाहिकाम् । नानेन सदृशं लोहं विद्यते ग्रहणीहरम् ॥ ७ ॥ पीपल, सोंठ, पाठ, “सोंठ, मिरच, पीपल; हरड, बहेडा, आमला ” दालचीनी, इलायची, तेजपात, बेलगिरी, चन्दन और सुगंधवाला इन सब औषधियोंको समान भाग लेवे और सबकी बराबर लोह भस्म लेवे, सबको एकत्र जलमें पीसकर गोली बना लेवे। पश्चात् इसको उप- युक्त मात्रानुसार उपयुक्त अनुपानके साथ सेवन करे तो अतिसार और समस्त उपद्रवसंयुक्त प्रवाहिका रोग नष्ट होते हैं । इसके समान संग्रहणीको हरनेवाली अन्य औषधि नहीं है । इसको कणा- द्यलोह कहते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ बृहद्गगनसुन्दर रस । पारदं गन्धकं चाभ्रं लोहं चापि वराटकम् । रूप्यं चातिविषं कर्षं समभागं प्रकल्पयेत् ॥ ८ ॥ धान्यशुण्ठीकृतक्वाथैर्भावयेच्च पृथक् पृथक् । गुञ्जाप्रमाणां वटिकां कारयेत्कुशलो भिषक् ॥ ९ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चकः । दग्धबिल्वं गुडेनैव कुर्यात्तदनुपानकम् ॥ १० ॥
( १९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अजादुग्धेन वा पेयं जम्बुत्वक्साधितं रसम् । अतीसारे ज्वरे घोरे ग्रहण्यामरुचौ तथा ॥११॥ सामे सशूले रक्ते च पिच्छास्रावे भ्रमे तथा । शोथे रक्तातिसारे च संग्रहग्रहणीषु च ॥ १२ ॥ पारा १ तोला, गन्धक १ तोला, अभ्रकभस्म १ तोला, लोहभस्म १ तोला, कौड़ीकी भस्म १ तोला, चांदीकी भस्म १ तोला और अतीस १ तोला इन सब औषधियोंको अच्छे प्रकारसे खरल करे; पश्चात् धनिये और सोंठके क्वाथमें अलग अलग भावना देवे। फिर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् प्रातःकाल उठकर प्रथम गुरु, देव और ब्राह्मणोंकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करे । पश्चात् भुने हुए बेल, गुड़, अथवा बकरीका दूध और जामुनकी छालके रसका अनुपान करे । इस औषधिके भक्षण करनेसे अतिसार, घोर ज्वर, ग्रहणी, अरुचि, आमशूल, रक्तस्राव, आँव, भ्रम, शोथ, रक्तातीसार और संग्रहणीरोग नष्ट होते हैं । इसको बृहद्गगन- सुन्दर रस कहते हैं ॥ ८-१२ ॥ लोकनाथ रस । भस्म सूतस्य भागैकं चत्वारः शुद्धगन्धकात् । क्षिप्त्वा वराटिकागर्भे टंकणेन निरुध्य च ॥ १३ ॥ भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पाच्यं स्वांगशीतं समुद्धरेत् । लोकनाथरसो नाम क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥१४॥ नागरातिविषा मुस्तं देवदारु वचान्वितम् । कषायमनुपानन्तु सर्वातीसारनाशनः ॥ १५ ॥ पारद भस्म या रससिंदूर १ भाग, शुद्ध गन्धक ४ भाग इन दोनोंको खरल करके कौड़ियोंमें भरकर और सुहागेसे कौड़ियोंके मुखको बंद करके मूषामें रखकर पुटपाक करे । स्वांग शीतल होनेपर
: Wait! Is it 'प'? Let's compare it to 'प' in "समुद्धृत्य" (no 'प' there), in "सपपत्रञ्च": Wait! Let's count letters: स (1) प (2) Look at the 3rd glyph: it has the exact same shape as 'प'! Wait! Does it say "सपपत्रञ्च"? Wait, why would it say "सपपत्रञ्च"? Could it be "सपत्रञ्च"? Wait! Let's zoom in to 500% on that word: Look at: Letter 1: 'स' Letter 2: 'प' Letter 3: 'त्र' with a bindu? No, wait! Wait, look at letter 2 and letter 3: Letter 2 is 'प'. Letter 3 is 'त्र'? Wait, look at letter 3: it has a vertical line, and a loop? Wait! "सपत्नञ्च"? No! "सपत्रञ्च"? Wait, look at the bottom: there is a diagonal stroke going down-left, exactly like the 'त्र' in "पात्रे" (line 11)! Wait, look at "पात्रे": प - ा - त्रे. The 'त्र' has: a left angle '<' attached to the vertical line! Now look at this word in line 13: स then प then... wait, is there another letter
( १९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गोलियोंके सेवन करनेसे त्रिदोषज अतिसार और संग्रहणी रोग नष्ट हो जाते हैं । दोषानुसार इसके अनुपानकी कल्पना करे । इसको चिन्तामणि रस कहते हैं ॥ १६-२० ॥ अहिफेनवटिका । अहिफेनं सखर्जूरं घृष्ट्वा गुञ्जैकमात्रकम् । रक्तस्रावमतीसारमतिवृद्धं विनाशयेत् ॥ २१ ॥ अफीम और छुहारा इन दोनोंको एकत्र पीसकर एक एक रत्तीकी गोली बनाकर सेवन करनेसे रक्तातीसार, रुधिरका स्राव और सब प्रकारके अत्यन्त बढ़े हुए अतिसार नष्ट होते हैं ॥ २१ ॥ महागन्धक । रसगन्धकयोः कर्ष ग्राह्यमेकं सुशोधितम् । ततः कज्जलिकां कृत्वा मृदुपाकेन साधयेत् ॥२२॥ जातीफलं तथा कोषं लवङ्गारिष्टपत्रके । सिन्धुवारदलञ्चैव एलाबीजं तथैव च ॥ २३ ॥ एषां च कर्षमात्रेण तोयेनाथ विमर्दयेत् । मुक्तागृहे पुनः स्थाप्यं पुटपाकेन साधयेत् ॥२४॥ घनपङ्कैर्बहिर्लिप्त्वा पुटमध्ये निधापयेत् । गुञ्जाष्टकप्रमाणेिन प्रत्यहं भक्षयेन्नरः ॥ २५ ॥ शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गंधक एक तोला लेवे; फिर इन दोनोंको एकत्र पीसकर कज्जली बना लेवे । फिर रसपर्पटीके समान इसको मृदुपाकसे पकाकर इसमें जायफल, जावित्री, लौंग, नीमके पत्ते, सम्हालूके पत्ते और इलायची यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला मिलाकर जलमें पीस गोला बनाकर दोसीपियोंमें बन्दकर २-३ अंगुल मोटी कपड़मिट्टीकर मृदुपुटपाकसे पकाकर ६ रति परिमाण प्रतिदिन सेवन करे ॥ २२-२५ ॥
भाषाटीकासहित । ( १९६ ) एतत्प्रोक्तं कुमाराणां रक्षणाय महौषधम् । ज्वरघ्नं दीपनञ्चैव बलवर्णप्रसाधनम् ॥ २६ ॥ दुर्वारं ग्रहणीरोगं जयत्येव प्रवाहिकाम् । सूतिकाञ्च जयेदेतद्रक्ताशों रक्तसम्भवम् ॥ २७ ॥ पिशाचा दानवा दैत्या बालानां विघ्नकारकाः । यत्रौषधवरस्तिष्ठेत्तत्र सीमां न यांति ते ॥ २८ ॥ बालानां गदयुक्तानां स्त्रीणाञ्चैव विशेषतः । महागन्धकमेतद्धि सर्वव्याधिनिषूदनम् ॥ २९ ॥ यह बालकोंकी रक्षाके लिये उत्तम औषधि है। यह औषधि ज्वर- नाशक, अग्निप्रदीपक, बल और वर्णको बढ़ानेवाली तथा दुस्तर संग्र- हणी रोग, प्रवाहिका, सूतिकारोग, रक्तार्श और रक्तोत्पन्न रोगोंको नष्ट करती है। जिस स्थानमें यह औषधि स्थित रहती है वहां बाल- कोंके विघ्न करनेवाले पिशाच, दानव, दैत्य दूर भाग जाते हैं। यह रोगी बालक और स्त्रीजनोंको अतीव उपकारी है। इसको महागन्धक कहते हैं ॥ २६-२९ ॥ सर्वांगसुन्दर रस । विना पाकेन सर्वाङ्गसुन्दरोऽयं प्रकीर्त्तितः ॥ ग्रहण्यां ये रसाः प्रोक्तास्तेऽतीसारे प्रकीर्तिताः॥३०॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे अतिसाररोगचिकित्सा । पूर्वोक्त महागन्धक पाकरहितको सर्वांगसुन्दर रस कहते हैं। केवल अन्तर इतना है कि महागन्धकका पाक किया जाता है और सर्वांग- सुन्दरका पाक नहीं किया जाता । संग्रहणीरोगमें जो रस कहे हैं वह अतीसार रोगमें भी प्रयुक्त करने चाहिये ॥ ३० ॥ इति अतिसाररोगचिकित्सा ।
( १९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ ग्रहणीरोगचिकित्सा । जातीफलादिग्रहणीकपाट रस । जातीफलं टङ्कणमभ्रकञ्च धूस्तूरबीजं समभाग- चूर्णम् । भागद्वयं स्यादहिफेनकस्य गन्थालिका- पत्ररसेन मर्द्यम् ॥१॥ चणप्रमाणा वटिका विधेया यत्नाद्विदद्याद् ग्रहणीगदेषु । सामेषु रक्तेषु सशूल- केषु पक्वेष्वपक्वेषु गुदामयेषु ॥ २ ॥ रोगेषु दद्या- दनुपानभेदैर्मधुप्रयुक्तां ग्रहणीगदेषु । पथ्यं सद- ध्योदनमत्र देयं रसोत्तमोऽयं ग्रहणीकपाटः ॥ ३ ॥ जायफल, सुहागा, अभ्रकभस्म और धतूरेके बीज यह प्रत्येक एक एक भाग और अफीम २ भाग लेवे; इन सब औषधियोंको गन्धप्रसा- रणीके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके चनेकी बराबर गोलियां बना लेवे । इन गोलियोंका आमसंयुक्त, रुधिरसहित, शूलसमेत और पक्वा- पक्व ग्रहणी रोग तथा अर्शोरोगमें सेवन करना चाहिये । रोगीकी अव- स्थाको विचारकर अनुपानकी कल्पना करे । संग्रहणीरोगमें इस औष- धिका सहतके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेपर दहीके साथ भातका पथ्य देवे । इसको जातीफलादिग्रहणीकपाट रस कहते हैं ॥ १-३॥ ग्रहणीकपाट रस । टंकणक्षारगन्धाश्मरसं जातीफलं तथा । बिल्वं खदिरसारञ्च जीरकं श्वेतधूनकम् ॥ ४ ॥ कपिहस्तकबीजञ्च तथा चोरकपुष्पकम् । एषां शाणं समादाय श्लक्ष्णचूर्णञ्च कारयेत् ॥ ५ ॥
भाषाटीकासहित । ( १९७ ) बिल्वपत्रककार्पासफलं शालिञ्च दुग्धिका । शालिञ्च मूलं कुटजं तथा कञ्चटपत्रकम् ॥ ६ ॥ सर्वेषां स्वरसेनैव वटिकां कारयेद्भिषक् । रक्तिकैकप्रमाणेन खादयेद्दिवसत्रयम् ॥ ७ ॥ दधिमस्तु ततः पेयं पलमात्रप्रमाणतः । अपि योगशताक्रान्तां ग्रहणीमुद्धतां जयेत् ॥ ८ ॥ आमशूलं ज्वरं कासं श्वासञ्चैव प्रवाहिकाम् । रक्तस्रावकरं द्रव्यं कार्यं नैवात्र युक्तितः ॥ ९ ॥ कृष्णवार्त्ताकुमत्स्यञ्च दधि तक्रञ्च शस्यते । ज्ञात्वा वायोः कृतिं तत्र तैलं वारि प्रदापयेत् ॥ १० ॥ सुहागा, गन्धक, पारा, जायफल, बेलगिरी, खैरसार, जीरा, सफेद राल, कौंचके बीज और चोरहुली इन प्रत्येक औषधिको चार चार मासे लेवे, सबका बारीक चूर्ण कर लेवे। फिर इस चूर्णको बेलके पत्ते, कपासके फल, शालि धान, दुद्धी, शालिंचकी जड़, कुड़ेकी छाल और जलचौलाईके स्वरसमें अलग अलग खरलकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोलीके हिसाबसे तीन दिन तक खाये और ऊपरसे चार तोले दहीका पानी पीवे। जो ग्रहणीरोग सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे आरोग्य नहीं होता वह इससे अवश्य दूर होता है। तथा आमशूल, ज्वर, खांसी, श्वास और प्रवाहिका इन सब रोगोंको भी दूर करता है। इसपर रुधिरको स्रावण कराने- वाले द्रव्य त्याग देवे । तथा काला बैंगन, मछली, दही और तक्रका सेवन पथ्य है। पवनसे बचाकर तैल और जलादिकसे स्नान करनेकी व्यवस्था करे ॥ ४-१० ॥ जातीफलाद्या वटिका । अभ्रस्य सूतस्य च गन्धकस्य प्रत्येकशो माष-