भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १९७ ) बिल्वपत्रककार्पासफलं शालिञ्च दुग्धिका । शालिञ्च मूलं कुटजं तथा कञ्चटपत्रकम् ॥ ६ ॥ सर्वेषां स्वरसेनैव वटिकां कारयेद्भिषक् । रक्तिकैकप्रमाणेन खादयेद्दिवसत्रयम् ॥ ७ ॥ दधिमस्तु ततः पेयं पलमात्रप्रमाणतः । अपि योगशताक्रान्तां ग्रहणीमुद्धतां जयेत् ॥ ८ ॥ आमशूलं ज्वरं कासं श्वासञ्चैव प्रवाहिकाम् । रक्तस्रावकरं द्रव्यं कार्यं नैवात्र युक्तितः ॥ ९ ॥ कृष्णवार्त्ताकुमत्स्यञ्च दधि तक्रञ्च शस्यते । ज्ञात्वा वायोः कृतिं तत्र तैलं वारि प्रदापयेत् ॥ १० ॥ सुहागा, गन्धक, पारा, जायफल, बेलगिरी, खैरसार, जीरा, सफेद राल, कौंचके बीज और चोरहुली इन प्रत्येक औषधिको चार चार मासे लेवे, सबका बारीक चूर्ण कर लेवे। फिर इस चूर्णको बेलके पत्ते, कपासके फल, शालि धान, दुद्धी, शालिंचकी जड़, कुड़ेकी छाल और जलचौलाईके स्वरसमें अलग अलग खरलकर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे। प्रतिदिन एक गोलीके हिसाबसे तीन दिन तक खाये और ऊपरसे चार तोले दहीका पानी पीवे। जो ग्रहणीरोग सैकड़ों औषधियोंके सेवन करनेसे आरोग्य नहीं होता वह इससे अवश्य दूर होता है। तथा आमशूल, ज्वर, खांसी, श्वास और प्रवाहिका इन सब रोगोंको भी दूर करता है। इसपर रुधिरको स्रावण कराने- वाले द्रव्य त्याग देवे । तथा काला बैंगन, मछली, दही और तक्रका सेवन पथ्य है। पवनसे बचाकर तैल और जलादिकसे स्नान करनेकी व्यवस्था करे ॥ ४-१० ॥ जातीफलाद्या वटिका । अभ्रस्य सूतस्य च गन्धकस्य प्रत्येकशो माष-