भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (१९१) णोंकी पूजा करके प्रातःकाल इस औषधिका सेवन करे । इससे अनेक प्रकारका अतिसार, सर्व प्रकारकी संग्रहणी, अम्लपित्त, शूल और परिणामशूल नष्ट होजाते हैं । यह रसायन और वाजीकरण कर्ममें श्रेष्ठ औषधि है । इसको पूर्णचन्द्रोदयरस कहते हैं ॥ २–५ ॥ कणाद्यलोह । कणानागरपाठाभित्रिवर्गत्रितयेन च । बिल्वचन्दनह्रीबेरैः सर्वातीसारजिद्भवेत् ॥ ६ ॥ सर्वोपद्रवसंयुक्तामपि हन्ति प्रवाहिकाम् । नानेन सदृशं लोहं विद्यते ग्रहणीहरम् ॥ ७ ॥ पीपल, सोंठ, पाठ, “सोंठ, मिरच, पीपल; हरड, बहेडा, आमला ” दालचीनी, इलायची, तेजपात, बेलगिरी, चन्दन और सुगंधवाला इन सब औषधियोंको समान भाग लेवे और सबकी बराबर लोह भस्म लेवे, सबको एकत्र जलमें पीसकर गोली बना लेवे। पश्चात् इसको उप- युक्त मात्रानुसार उपयुक्त अनुपानके साथ सेवन करे तो अतिसार और समस्त उपद्रवसंयुक्त प्रवाहिका रोग नष्ट होते हैं । इसके समान संग्रहणीको हरनेवाली अन्य औषधि नहीं है । इसको कणा- द्यलोह कहते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ बृहद्गगनसुन्दर रस । पारदं गन्धकं चाभ्रं लोहं चापि वराटकम् । रूप्यं चातिविषं कर्षं समभागं प्रकल्पयेत् ॥ ८ ॥ धान्यशुण्ठीकृतक्वाथैर्भावयेच्च पृथक् पृथक् । गुञ्जाप्रमाणां वटिकां कारयेत्कुशलो भिषक् ॥ ९ ॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चकः । दग्धबिल्वं गुडेनैव कुर्यात्तदनुपानकम् ॥ १० ॥