भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 584 में से

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( १९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अजादुग्धेन वा पेयं जम्बुत्वक्साधितं रसम् । अतीसारे ज्वरे घोरे ग्रहण्यामरुचौ तथा ॥११॥ सामे सशूले रक्ते च पिच्छास्रावे भ्रमे तथा । शोथे रक्तातिसारे च संग्रहग्रहणीषु च ॥ १२ ॥ पारा १ तोला, गन्धक १ तोला, अभ्रकभस्म १ तोला, लोहभस्म १ तोला, कौड़ीकी भस्म १ तोला, चांदीकी भस्म १ तोला और अतीस १ तोला इन सब औषधियोंको अच्छे प्रकारसे खरल करे; पश्चात् धनिये और सोंठके क्वाथमें अलग अलग भावना देवे। फिर एक एक रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् प्रातःकाल उठकर प्रथम गुरु, देव और ब्राह्मणोंकी पूजा करके इस औषधिका सेवन करे । पश्चात् भुने हुए बेल, गुड़, अथवा बकरीका दूध और जामुनकी छालके रसका अनुपान करे । इस औषधिके भक्षण करनेसे अतिसार, घोर ज्वर, ग्रहणी, अरुचि, आमशूल, रक्तस्राव, आँव, भ्रम, शोथ, रक्तातीसार और संग्रहणीरोग नष्ट होते हैं । इसको बृहद्गगन- सुन्दर रस कहते हैं ॥ ८-१२ ॥ लोकनाथ रस । भस्म सूतस्य भागैकं चत्वारः शुद्धगन्धकात् । क्षिप्त्वा वराटिकागर्भे टंकणेन निरुध्य च ॥ १३ ॥ भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पाच्यं स्वांगशीतं समुद्धरेत् । लोकनाथरसो नाम क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥१४॥ नागरातिविषा मुस्तं देवदारु वचान्वितम् । कषायमनुपानन्तु सर्वातीसारनाशनः ॥ १५ ॥ पारद भस्म या रससिंदूर १ भाग, शुद्ध गन्धक ४ भाग इन दोनोंको खरल करके कौड़ियोंमें भरकर और सुहागेसे कौड़ियोंके मुखको बंद करके मूषामें रखकर पुटपाक करे । स्वांग शीतल होनेपर

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