भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( १९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ अतिसारचिकित्सा । अतिसारवारण रस । दरदं कृतकर्पूरं मुस्तेन्द्रयवसंयुतम् । सर्वातिसारशमनं खाखसीक्षीरभावितम् ॥ १ ॥ सिंग्रफ, पक्ककपूर, नागरमोथा और इन्द्रजौ यह सब औषधि समान भाग लेकर अफीमके पानीकी भावना देवे । इसको यथायोग्य अनुपान और उचित मात्रानुसार सेवन करनेसे सब प्रकारका अतीसार नष्ट होता है । इसको अतिसारवारण रस कहते हैं ॥ १ ॥ पूर्णचन्द्रोदय रस । शुद्धञ्च तालकं लोहं गगनं च पलं पलम् । कर्पूरं पारदं गन्धं प्रत्येकं वटकोन्मितम् ॥ २ ॥ जातीकोषं सुरापत्रं शटी तालीशकेशरम् । व्योषं चोचं कणामूलं लवंगं पिचुसम्मितम् ॥ ३॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय गुरुदेवद्विजार्चकः । नानारूपमतीसारं ग्रहणीं सर्वरूपिणीम् ॥ ४ ॥ अम्लपित्तं तथा शूलं शूलं च परिणामजम् । रसायनवरश्चायं वाजीकरण उत्तमः ॥ ५ ॥ शुद्ध हरितालभस्म ४ तोले, लोहभस्म ४ तोले, अभ्रकभस्म ४ तोले, कपूर ८ मासे, पारा ८ मासे, गन्धक ८ मासे, जायफल, कपूरकचरी, तेजपात, कचूर, तालीशपत्र, नागकेशर, सोंठ, पीपल, कालीमिरच, दारचीनी, पीपलामूल और लवंग यह प्रत्येक एक एक तोला इन सब औषधियोंको एकत्र करके जलमें पीसकर गोली बनाकर यथा- योग्य मात्रानुसार रोगीको सेवन करावे । गुरु, देवता और ब्राह्म-