रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १८९ ) नागरादि चूर्ण । नागरातिविषा मुस्तं देवदारु कणा वचा । यमानी वालकं धान्यं कुटजत्वक् हरीतकी ॥ ४२॥ धातकीन्द्रयवौ बिल्वं पाठा मोचरसं समम् । चूर्णितं मधुना लेह्यमनुपानं सुखावहम् ॥ ४३ ॥ सोंठ, अतीस, नागरमोथा, देवदारु, पीपल, वच, अजवायन, सुगंधवाला, धनिया, कुड़ेकी छाल, हरड़, धायके फूल, इन्द्रजौ, बेल- गिरी, पाठ और मोचरस यह सब औषधि समान भाग लेकर चूर्ण करके शहदमें मिला उपरोक्त मृतसंजीवनी गोलीके ऊपर चाटे तो सब अतिसार दूर हों। अथवा यह अकेला चूर्ण भी उचित अनुपानसे सेवन करे तो अतिसार रोगको दूर करता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ प्राणेश्वर रस । रसं गन्धकमभ्रं च टंकणं शतपुष्पकम् । यमानी जीरकाख्यं च प्रत्येकं कर्षयुग्मकम् ॥ ४४॥ कर्षमेकं यवक्षारं हिंगुं पटुकपंचकम् । विडंगेन्द्रयवं सर्जरसकं चाग्निसंज्ञितम् ॥ घृष्ट्वा च वटिका कार्या नाम्ना प्राणेश्वरो रसः॥४५॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे ज्वरातिसारचिकित्सा । पारा, गन्धक, अभ्रकभस्म, सुहागा, सौंफ, अजवायन और जीरा यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले,जवाखार एक तोला, हींग,पांचों लवण, वायविडंग, इन्द्रजौ, राल और चित्रककी छाल यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेकर सबको एकत्र पीसकर जलसे एक एक रत्तीकी गोली बना लेव;इसके सेवनसे ज्वर, अतिसार रोग दूर होते हैं । इसको प्राणे- श्वर रस कहते हैं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ इति ज्वरातिसारचिकित्सा ॥